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बृहत्संहिता • अध्याय 100 • श्लोक 4
कृषिवीजगृहाश्रयजानि गरे वणिजि ध्रुवकार्यवणिग्युतयः । न हि विष्टिकृतं विदधाति शुभं परघातविषादिषु सिद्धिकरम् ॥
गर करण में खेती, बौज और आश्रमसम्बन्धी कार्य करना शुभ है। वणिज करण में स्थिर कार्य, वाणिज्य और युति (किसी के साथ संयोग) सम्बन्धी कार्य करना शुभ है। विष्टि करण में किया हुआ कोई भी कार्य शुभ नहीं होता है; किन्तु केवल शत्रुओं का नाश, विष आदि का प्रयोग और अग्निदाह आदि कार्य करना शुभ है।
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