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अध्याय 33 — अध्याय 33

यजुर्वेद
97 श्लोक • केवल अनुवाद
हे मनुष्यो ! जो (अस्य) इस पूर्वाध्यायोक्त ईश्वर की सृष्टि में (अजरासः) एक-सी अवस्थावाले (अरित्राः) शत्रुओं से बचानेहारे (अर्चद्धूमासः) सुगन्धित धूमों से युक्त (पावकाः) पवित्रकारक (श्वितीचयः) श्वेतवर्ण को सञ्चित करनेहारे (श्वात्रासः) धन को बढ़ाने के हेतु (भुरण्यवः) धारण करनेहारे वा गमनशील (सोमाः) ऐश्वर्य को प्राप्त करनेहारे (अग्नयः) विद्युत् आदि अग्नि (वनर्षदः) वनों वा किरणों में रहनेहारे (वायवः) पवनों के (न) समान (दमाम्) घरों के धारण करनेहारे उनको तुम लोग जानो।
हे मनुष्यो ! जो (धूमकेतवः) जिनका जतानेवाला धूम ही पताका के तुल्य है (वातजूताः) वायु से तेज को प्राप्त हुए ((हरयः) हरणशील (अग्नयः) पावक (वृथक्) नाना प्रकार से (द्यवि) प्रकाश के निमित्त (उप, यतन्ते) यत्न करते हैं, उनको कार्य्यसिद्धि के अर्थ उपयोग में लाओ ।
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (नः) हमारे (मित्रावरुणा) मित्र और श्रेष्ठ जनों तथा (देवान्) विद्वानों का (यज) सत्कार कीजिये, (बृहत्) बड़े (ऋतम्) सत्य का (यज) उपदेश कीजिये, जिससे (स्वम्) अपने (दमम्) घर को (यक्षि) संगत कीजिये।
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (रथीरिव) सारथि के समान (देवहूतमान्) विद्वानों से अत्यन्त स्तुति किये हुए (अश्वान्) शीघ्रगामी अग्नि आदि वा घोड़ों को (युक्ष्व) युक्त कीजिये (पूर्व्यः) पूर्वज विद्वानों से विद्या को प्राप्त (होता) ग्रहण करते हुए (हि) निश्चय कर (नि, सदः) स्थिर हूजिये।
हे मनुष्यो ! जैसे (स्वर्थे) सुन्दर प्रयोजनवाली (द्वे) दो (विरूपे) भिन्न-भिन्न रूप की स्त्रियाँ (चरतः) भोजनादि आचरण करती हैं और (अन्यान्या) एक-एक अलग-अलग समय में (वत्सम्) निरन्तर बोलनेवाले एक बालक को (उप, धापयेते) निकट कर दूध पिलाती हैं, उन दोनों में से (अन्यस्याम्) एक में (स्वधावान्) प्रशस्त शान्ति आदि अमृत तुल्य गुणयुक्त (हरिः) मन को हरनेवाला पुत्र (भवति) होता और (शुक्रः) शीघ्रकारी (सुवर्चाः) सुन्दर तेजस्वी (अन्यस्याम्) दूसरी में हुआ (ददृशे) दीख पड़ता है, वैसे ही सुन्दर प्रयोजनवाले दो काले-श्वेत भिन्न रूपवाले रात्रि-दिन वर्त्तमान हैं और एक-एक भिन्न-भिन्न समय में एक संसाररूप बालक को दुग्धादि पिलाते हैं, उन दोनों में से एक रात्रि में अमृतरूप गुणोंवाला मन का प्रसादक चन्द्रमा उत्पन्न होता और द्वितीय दिनरूप वेला में पवित्रकर्त्ता सुन्दर तेजवाला सूर्यरूप पुत्र दीख पड़ता है, ऐसा तुम लोग जानो।
हे मनुष्यो ! जैसे (धातृभिः) धारण करनेवालों से (इह) इस संसार में (विशे विशे) प्रजा-प्रजा के लिये (अयम्) यह (प्रथमः) विस्तारवाला (होता) सुखदाता (यजिष्ठः) अतिशय कर संगत करनेवाला (अध्वरेषु) रक्षणीय व्यवहारों में (ईड्यः) खोजने योग्य विद्युत् आदि स्वरूप अग्नि (धायि) धारण किया जाता और जैसे (भृगवः) दृढ़ ज्ञानवाले (अप्नवानः) सुसन्तानों के सहित उत्तम शिष्य लोग (यम्) जिस (वनेषु) वनों वा किरणों में (चित्रम्) आश्चर्यरूप गुण, कर्म, स्वभाव (विभ्वम्) व्यापक विद्युत् रूप अग्नि को (विरुरुचुः) विशेष कर प्रदीप्त करें, वैसे उसको तुम लोग भी धारण और प्रकाशित करो।
हे मनुष्यो ! जैसे (त्रिंशत्) पृथिवी आदि तीस (च) और (नव) नव प्रकार के (च) ये सब और (देवाः) विद्वान् लोग (त्रीणि) तीन (शता) सौ (त्री) तीन (सहस्राणि) हजार कोश मार्ग में (अग्निम्) अग्नि को (असपर्य्यन्) सेवन करें, (घृतैः) घी वा जलों से (औक्षन्) सीचें, (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (अस्तृणन्) आच्छादित करें, (अस्मै) इस अग्नि के अर्थ (होतारम्) हवन करनेवाले को (आत्, इत्) सब ओर से ही (नि, असादयन्त) निरन्तर स्थापित करें, वैसे तुम लोग भी करो।
हे मनुष्यो ! जैसे (देवाः) विद्वान् लोग (दिवः) आकाश के (मूर्द्धानम्) उपरिभाग में सूर्यरूप से वर्त्तमान (पृथिव्याः) पृथिवी को (अरतिम्) प्राप्त होनेवाले (वैश्वानरम्) सब मनुष्यों के हितकारी (ऋते) यज्ञ के निमित्त (आ, जातम्) अच्छे प्रकार प्रकट हुए (कविम्) सर्वत्र दिखानेवाले (सम्राजम्) सम्यक् प्रकाशमान (जनानाम्) मनुष्यों के (अतिथिम्) अतिथि के तुल्य प्रथम भोजन का भाग लेनेवाले (पात्रम्) रक्षा के हेतु (आसन्) ईश्वर के मुखरूप सामर्थ्य में उत्पन्न हुए जो (अग्निम्) अग्नि को (आ, जनयन्त) अच्छे प्रकार प्रकट करें, वैसे तुम लोग भी इसको प्रकट करो ।
हे विद्वन् ! जैसे (समिद्धः) सम्यक् प्रदीप्त (शुक्रः) शीघ्रकारी (अग्निः) सूर्य्यादिरूप अग्नि (वृत्राणि) मेघ के अवयवों को (जङ्घनत्) शीघ्र काटता है, वैसे (द्रविणस्युः) अपने धन को चाहनेवाले (आहुतः) बुलाये हुए आप (विपन्यया) विशेष व्यवहार की युक्ति से दुष्टों को शीघ्र मारिये ।
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान तेजस्वी विद्वन् ! आप जैसे सूर्य (विश्वेभिः) सब (धामभिः) धामों से (इन्द्रेण) धन के धारक (वायुना) बलवान् पवन के साथ (सोम्यम्) उत्तम ओषधियों में हुए (मधु) मीठे आदि गुणवाले रस को पीता है, वैसे (मित्रस्य) मित्र के सब स्थानों से सुन्दर ओषधियों के रस को (पिब) पीजिये ।
हे मनुष्यो ! (यत्) जब (इषे) वर्षा के लिये (निषिक्तम्) अग्नि में घृतादि के पड़ने से निरन्तर बढ़ा हुआ (शुचि) पवित्र (तेजः) यज्ञ से उठा तेज (नृपतिम्) जैसे राजा का तेज व्याप्त हो वैसे सूर्य को (आ, आनट्) अच्छे प्रकार व्याप्त होता है, तब (अग्निः) सूर्यरूप अग्नि (शर्द्धम्) बलहेतु (अनवद्यम्) निर्दोष (युवानम्) ज्वानी को करनेहारे (स्वाध्यम्) जिनका सब चिन्तन करते (रेतः) ऐसे पराक्रमकारी वृष्टि जल को (द्यौः) आकाश के (अभीके) निकट (जनयत्) उत्पन्न करता (च) और (सूदयत्) वर्षा करता है।
हे (अग्ने) विद्वान् वा राजन् ! आप (महते) बड़े (सौभगाय) सौभाग्य के अर्थ (शर्द्ध) दुष्ट गुणों और शत्रुओं के नाशक बल को (आकृणुष्व) अच्छे प्रकार उन्नत कीजिये, जिससे (तव) आपके (द्युम्नानि) धन वा यश (उत्तमानि) श्रेष्ठ (सन्तु) हों, आप (जास्पत्यम्) स्त्री-पुरुष के भाव को (सुयमम्) सुन्दर नियमयुक्त शास्त्रानुकूल ब्रह्मचर्ययुक्त (सम्, आ) सम्यक् अच्छे प्रकार कीजिये और आप (शत्रूयताम्) शत्रु बनने की इच्छा करते हुए मनुष्यों के (महांसि) तेजों को (अभि, तिष्ठ) तिरस्कृत कीजिये।
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान राजन् ! वा विद्वज्जन ! (हि) जिससे आप (नः) हम ब्रह्मचर्यादि सत्कर्मों में प्रवृत्त जनों के (महि) महत् गम्भीर वचन को (श्रोषि) सुनते हो, इससे (मन्द्रतमम्) अतिशय कर प्रशंसादि से सत्कार को प्राप्त (त्वाम्) आपको (अर्कशौकैः) सूर्य के समान प्रकाश से युक्त जनों के साथ हम लोग (ववृमहे) स्वीकार करते हैं और (नृतमाः) अतिशय कर नायक श्रेष्ठजन (शवसा) बल से युक्त (इन्द्रम्) सूर्य के (न) समान तेजस्वी और (वायुम्) वायु के तुल्य वर्त्तमान बलवान् (देवता) दिव्यगुणयुक्त (त्वा) आपको (राधसा) धन से (पृणन्ति) पालन वा पूर्ण करते हैं ।
हे (स्वाहुत) सुन्दर प्रकार से विद्या को ग्रहण किये हुए (अग्ने) विद्वन् ! (ये) जो (जनानाम्) मनुष्यों के बीच वीर पुरुष (यन्तारः) जितेन्द्रिय (मघवानः) बहुत धन से युक्त जन (गोनाम्) पृथिवी वा गौ आदि के (ऊर्वान्) हिसकों को (दयन्त) मारते हैं, वे (सूरयः) विद्वान् लोग (त्वे) आपके (प्रियासः) पियारे (सन्तु) हों।
हे (श्रुत्कर्ण) अर्थियों के वचनों को सुननेहारे (अग्ने) अग्नि के तुल्य वर्त्तमान तेजस्वी विद्वन् ! वा राजन् ! आप (सयावभिः) जो साथ चलते उन (वह्निभिः) कार्यों का निर्वाह करनेहारे (देवैः) विद्वानों के साथ (अध्वरम्) रक्षा के योग्य राज्य के व्यवहार को (श्रुधि) सुनिये तथा (प्रातर्यावाणः) प्रातःकाल राजकार्यों को प्राप्त करनेहारे (मित्रः) पक्षपातरहित सबका मित्र और (अर्यमा) वैश्य या अपने अधिष्ठाताओं को यथार्थ माननेवाला ये सब (बर्हिषि) अन्तरिक्ष के तुल्य सभा में (आ, सीदन्तु) अच्छे प्रकार बैठें ।
हे सभापते ! आप (विश्वेषाम्) सब (यज्ञियानाम्) पूजा सत्कार के योग्य (देवानाम्) विद्वानों के बीच (अदितिः) अखण्डित बुद्धिवाले (विश्वेषाम्) सब (मानुषाणाम्) मनुष्यों में (अतिथिः) पूजनीय (अवः) रक्षा आदि को (आवृणानः) अच्छे प्रकार स्वीकार करते हुए (सुमृडीकः) सुन्दर सुख देनेवाले (जातवेदाः) विद्या और योग के अभ्यास से प्रसिद्ध बुद्धिवाले (अग्निः) तेजस्वी राजा (भवतु) हूजिये।
हम राजपुरुष (महः) बड़े (समिधानस्य) प्रकाशमान (अग्नेः) विज्ञानवान् सभापति के (शर्मणि) आश्रय में (श्रेष्ठे) श्रेष्ठ (मित्रे) मित्र और (वरुणे) स्वीकार के योग्य मनुष्यों के निमित्त (अनागाः) अपराधरहित (स्याम) हों, (अद्य) आज (सवितुः) सब जगत् के उत्पादक परमेश्वर की (सवीमनि) आज्ञा में वर्त्तमान (स्वस्तये) सुख के लिये (देवानाम्) विद्वानों के (तत्) उस वेदोक्त (अवः) रक्षा आदि कर्म को (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं।
हे (इन्द्र) परमैश्वर्ययुक्त विद्वन् ! (ते) आपके (जरितारः) स्तुति करनेहारे (आपः) जलों के तुल्य (पिप्युः) बढ़ते हैं और (स्तर्यः) विस्तार के हेतु (गावः) किरणें (न) जैसे (ऋतम्) सत्य को (नक्षन्) व्याप्त होते हैं, वैसे (वायुः) पवन के (न) तुल्य (वाजान्) विज्ञानवाले (नः) हम लोगों को और (नियुतः) वायु के वेग आदि गुणों को (त्वम्) आप (अच्छ) अच्छे प्रकार (याहि) प्राप्त हूजिये (हि) जिस कारण (धीभिः) बुद्धि वा कर्मों से (वि, दयसे) विशेष कर कृपा करते हो, इससे (चित्) भी सत्कार के योग्य हो ।
हे मनुष्यो ! जैसे (गावः) गौवें वा किरणें (उभा) दोनों (रप्सुदा) रूप देनेवाली (मही) बड़ी आकाश-पृथिवी की रक्षा करती हैं, वैसे तुम लोग (हिरण्यया) सुवर्ण के आभूषण से युक्त (कर्णा) दोनों कानों और (यज्ञस्य) संगत यज्ञ के (अवतम्) वेदी आदि अवयवों की (उप, अवत) निकट रक्षा करो।
हे मनुष्यो ! (यत्) जो (अद्य) आज (सूरे) सूर्य के (उदिते) उदय होते अर्थात् प्रातःकाल (अनागाः) अधर्म के आचरण से रहित (मित्रः) सुहृद् (सविता) राज्य के नियमों से प्रेरणा करनेहारा (भगः) ऐश्वर्यवान् (अर्य्यमा) न्यायकारी राजा स्वस्थता को (सुवाति) उत्पन्न करे, वह राज्य करने के योग्य होवे ।
हे मनुष्यो ! (रसा) आनन्द देनेवाले तुम लोग (सुते) उत्पन्न हुए जगत् में (वृषभम्) अति बली (रोदस्योः) आकाश-पृथिवी को (अभिश्रियम्) सब ओर से शोभित करनेहारे (श्रियम्) शोभायुक्त सभापति राजा का (आ, सिञ्चत) अच्छे प्रकार अभिषेक करो और वह सभापति तुम लोगों को (दधीत) धारण करे ।
हे विद्वान् लोगो ! (विश्वे) सब आप जैसे (श्रियः) धनों वा शोभाओं को (वसानः) धारण करता हुआ (स्वरोचिः) स्वयमेव दीप्तिवाला (विश्वरूपः) सब पदार्थों में उन-उन के रूप से व्याप्त अग्नि (चरति) विचरता और (अमृतानि) नाशरहित वस्तुओं में (आ, तस्थौ) स्थित है, वैसे इस (आतिष्ठन्तम्) अच्छे प्रकार स्थिर अग्नि को (परि, अभूषन्) सब ओर से शोभित कीजिये। जो (वृष्णः) वर्षा करनेहारे (असुरस्य) हिंसक इस बिजुलीरूप अग्नि का (महत्) बड़ा (तत्) परोक्ष (नाम) नाम है, उससे सब कार्य्यों को शोभित करो ।
हे मनुष्य ! तुम (रोदसी) आकाश-भूमि (यस्य) जिस (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (सुमखम्) सुन्दर यज्ञ जिसमें हो, ऐसे (नृम्णम्) धन (सहः) बल (च) और (महि) बड़े (श्रवः) यश को (सपर्यतः) सेवते हैं, उस (विश्वानराय) सब मनुष्य जिसमें हों (महे) महान् (मन्दमानाय) आनन्दस्वरूप (विश्वाभुवे) सबको प्राप्त वा सब पृथिवी के स्वामी वा संसार जिससे हो, ऐसे ईश्वर के अर्थ (प्र, अर्च) पूजन करो अर्थात् उसको मानो वह (वः) तुम्हारे लिये (अन्धसः) अन्नादि के सुख को देवे ।
(येषाम्) जिनका (इध्मः) तेजस्वी (पृथुः) विस्तारयुक्त (स्वरुः) प्रतापी (युवा) ज्वान (बृहन्) महान् (इन्द्रः) उत्तम ऐश्वर्यवाला परमात्मा (सखा) मित्र है, (एषाम्) उन (इत्) ही का (भूरि) बहुत (शस्तम्) स्तुति के योग्य कर्म होता है।
हे (इन्द्र) ऐश्वर्य देनेवाले विद्वन् ! जिस कारण आप (ओजसा) पराक्रम के साथ (महान्) बड़े (अभिष्टिः) सब ओर से सत्कार के योग्य (विश्वेभिः) सब (सोमपर्वभिः) सोमादि ओषधियों के अवयवों और (अन्धसः) अन्न से (मत्सि) तृप्त होते हो, इससे हमको (आ, इहि) प्राप्त हूजिये।
(शर्द्धनीतिः) बल को प्राप्त (वर्पणीतिः) नाना प्रकार के रूपोंवाला (उशधक्) पर पदार्थों को चाहनेवाला चोरादि को नष्ट करनेहारा (इन्द्रः) सूर्य्य के तुल्य प्रतापी सभापति (वृत्रम्) प्रकाश को रोकनेहारे मेघ के तुल्य धर्म के निरोधक दुष्ट शत्रु को (अवृणोत्) युद्ध के लिये स्वीकार करे, (मायिनाम्) दुष्ट बुद्धिवाले छली-कपटी आदि को (प्र, अमिनात्) मारे, जो (वनेषु) वनों में रहनेवाले (व्यंसम्) कपटी हैं भुजा जिसकी, ऐसे चोर को (अहन्) मारे और (राम्याणाम्) आनन्द देनेवाले उपदेशकों की (धेनाः) वाणियों को (आविः, अकृणोत्) प्रकट करे, वही राजा होने को योग्य है।
हे (सत्पते) श्रेष्ठ सत्य व्यवहार वा श्रेष्ठ पुरुषों के रक्षक (इन्द्र) सभापते ! (माहिनः) महत्त्वयुक्त सत्कार को प्राप्त (त्वम्) आप (एकः) असहायी (सन्) होते हुए (कुतः) किस कारण (यासि) प्राप्त होते वा विचरते हो? (किम् ते) (इत्था) इस प्रकार करने में आपका क्या प्रयोजन है? हे (हरिवः) प्रशंसित मनोहारी घोड़ोंवाले राजन् ! (यत्) जिस कारण (अस्मे) हम लोग (ते) आपके हैं, इनसे (समराणः) सम्यक् चलते हुए आप (नः) हमको (सम्, पृच्छसे) पूछिये और (शुभानैः) मङ्गलमय वचनों के साथ (तत्) उस एकाकी रहने के कारण को (वोचेः) कहिये ।
हे (इन्द्र) राजन् ! (ये) जो (आयवः) सत्य को प्राप्त होनेवाले प्रजा जन (सकृत्स्वम्) एक बार उत्पन्न करनेवाली (पुरुपुत्राम्) बहुत अन्नादि व्यक्तिवाले पुत्रों से युक्त (सहस्रधाराम्) असंख्य सुवर्णादि धातु जिसमें धारारूप हों वा असंख्य प्राणिमात्र को धारण करनेहारी (बृहतीम्) विस्तारयुक्त (महीम्) बड़ी भूमि को (दुदुक्षन्) दोहना चाहें अर्थात् उससे इच्छापूर्ति किया चाहें (ये) जो मनुष्य (गोमन्तम्) खोटे इन्द्रियोंवाले लम्पट (ऊर्वम्) हिंसक जन को (अभि, तितृत्सान्) सम्मुख होकर मारने की इच्छा करें और जो (ते) आपके (तत्) उस राजकर्म की (आ, पनन्त) प्रशंसा करें, उनकी आप उन्नति किया कीजिये।
हे सभाध्यक्ष ! मैं (महीम्) सुन्दर पूज्य (इमाम्) इस (ते) आपकी (धियम्) बुद्धि वा कर्म को (प्र, भरे) धारण करता हूँ (स्तोत्रे) स्तुति होने में (अस्य) इस मेरी (धिषणा) बुद्धि (यत्) जिस (ते) आपको (आनजे) प्रकट करती है (तम्) उस (शवसा) बल के साथ (सासहिम्) शीघ्र सहनेवाले (इन्द्रम्) उत्तम बल के योग से शत्रुओं को विदीर्ण करनेहारे सभापति को (महः) महान् कार्य के (उत्सवे) करने योग्य आनन्द समय (च) और (प्रसवे) उत्पत्ति में (च) भी (देवासः) विद्वान् लोग (अनु, अमदन्) अनुकूलता से आनन्दित करें ।
(यः) जो (वातजूतः) वायु से वेग को प्राप्त सूर्य के तुल्य (विभ्राड्) विशेष कर प्रकाशवाला राजपुरुष (अविह्रुतम्) अखण्ड संपूर्ण (आयुः) जीवन (यज्ञपतौ) युक्तव्यवहारपालक अधिष्ठाता मैं (दधत्) धारण करता हुआ (त्मना) आत्मा से (प्रजाः) प्रजाओं को (अभिरक्षति) सब ओर से रक्षा करता हुआ (पुपोष) पुष्ट करता और (पुरुधा) बहुत प्रकारों से (वि, राजति) विशेषकर प्रकाशमान होता है, सो आप (बृहत्) बड़े (सोम्यम्) सोमादि ओषधियों के (मधु) मिष्टादि गुणयुक्त रस को (पिबतु) पीजिये ।
हे मनुष्यो ! जिस (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (देवम्) चिलचिलाते हुए (सूर्य्यम्) सूर्य्यमण्डल को (विश्वाय) संसार को (दृशे) देखने के लिये (केतवः) किरणें (उत्, वहन्ति) ऊपर को आश्चर्यरूप प्राप्त करती हैं (त्यम्) उस (उ) ही को तुम लोग जानो।
हे (पावक) पवित्रकर्त्ता (वरुण) श्रेष्ठ विद्वन् वा राजन् ! (त्वम्) आप (येन) जिस (चक्षसा) प्रकट दृष्टि वा उपदेश से (भुरण्यन्तम्) रक्षा करते हुए (अनु, पश्यसि) अनुकूल देखते हो, उससे (जनान्) हम आदि मनुष्यों को देखिये और आपके अनुकूल हम वर्त्तें।
हे (दैव्यौ) अच्छे उत्तम विद्वानों वा गुणों में प्रवीण (अध्वर्यू) अपने अहिंसारूप यज्ञ को चाहते हुए दो पुरुषो ! आप (सूर्यत्वचा) जिसका बाहरी आवरण सूर्य के तुल्य प्रकाशमान ऐसे (रथेन) चलनेवाले विमानादि यान से (आ, गतम्) आइये और (मध्वा) कोमल सामग्री से (यज्ञम्) यात्रा संग्राम वा हवनरूप यज्ञ को (सम्, अञ्जाथे) सम्यक् प्रकट करो।
हे (युवानः) ज्वान ब्रह्मचर्य के साथ विद्या पढ़े हुए उपदेष्टा लोगो ! (यथा) जैसे (विश्वानरः) सबका नायक (देवः) उत्तम गुणोंवाला (सविता) सूर्य्य के तुल्य प्रकाशमान विद्वान् (इडाभिः) वाणियों से (विदथे) जताने योग्य व्यवहार में (सुशस्ति) सुन्दर प्रशंसायुक्त (नः) हमारे (विश्वम्) सब (जगत्) चेतन पुत्र गौ आदि को (आ, एतु) अच्छे प्रकार होवे, वैसे (अभिपित्वे) सम्मुख जाने में तुम लोग (मत्सथ) आनन्दित हूजिये जो (नः) हमारी (मनीषा) बुद्धि है, उसको (अपि) भी शुद्ध कीजिये ।
हे (वृत्रहन्) मेघहन्ता सूर्य्य के तुल्य शत्रुहन्ता (सूर्य्य) विद्यारूप ऐश्वर्य के उत्पादक (इन्द्र) अन्नदाता सज्जन पुरुष ! (ते) आपके (यत्) जो (अद्य) आज दिन (सर्वम्) सब कुछ (वशे) वश में है (तत्) उसको (कत्, च) कब (अभि) (अगाः) सब ओर से उदित प्रकट सन्नद्ध कीजिये ।
हे (सूर्य) सूर्य के तुल्य वर्त्तमान तेजस्विन् ! जैसे (तरणिः) अन्धकार से पार करनेवाला (विश्वदर्शतः) सबको देखने योग्य (ज्योतिष्कृत्) अग्नि, विद्युत्, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रह, तारे आदि को प्रकाशित करनेवाले सूर्यलोक (रोचनम्) रुचिकारक (विश्वम्) समग्र राज्य को प्रकाशित करता है, वैसे आप (असि) हैं, जिस कारण न्याय और विनय से राज्य को (आ, भासि) अच्छे प्रकार प्रकाशित करते हो, इसलिये सत्कार पाने योग्य हो ।
हे मनुष्यो ! जगदीश्वर अन्तरिक्ष के (मध्या) बीच (यदा) जब (हरितः) जिन में पदार्थ हरे जाते उन दिशाओं और (विततम्) विस्तृत कार्यजगत् को (सम्, जभार) संहार कर अपने में लीन करता (सिमस्मै) सबके लिये (रात्री) रात्री के तुल्य (वासः) अन्धकाररूप आच्छादन को (तनुते) फैलाता और (आत्) इसके अनन्तर (सधस्थात्) एक स्थान से अर्थात् सर्व साक्षित्वादि से निवृत्त हो के एकाग्र (इत्) ही (अयुक्त) समाधिस्थ होता है, (तत्) वह (कर्त्तोः) करने को समर्थ (सूर्यस्य) चराचर के आत्मा परमेश्वर का (देवत्वम्) देवतापन (तत्) वही उसका (महित्वम्) बड़प्पन तुम लोग जानो ।
हे मनुष्यो ! (द्योः) प्रकाश के (उपस्थे) निकट वर्त्तमान अर्थात् अन्धकार से पृथक् (सूर्यः) चराचर का आत्मा (मित्रस्य) प्राण और (वरुणस्य) उदान के (तत्) उस (रूपम्) रूप को (कृणुते) रचता है जिससे मनुष्य (अभिचक्षे) देखता जानता है (अस्य) इस परमात्मा का (रुशत्) शुद्धस्वरूप और (पाजः) बल (अनन्तम्) अपरिमित (अन्यत्) भिन्न है और (अन्यत्) (कृष्णम्) अविद्यादि मलीन गुणवाले भिन्न जगत् को (हरितः) दिशा (सम्, भरन्ति) धारण करती हैं।
हे (सूर्य) चराचर के अन्तर्यामिन् ईश्वर ! जिस कारण आप (बट्) सत्य (महान्) महत्त्वादि गुणयुक्त (असि) हैं। हे (आदित्य) अविनाशीस्वरूप ! जिससे आप (बट्) अनन्त ज्ञानवान् (महान्) बड़े (असि) हो (सतः) सत्यस्वरूप (महः) महान् (ते) आपका (महिमा) महत्त्व (पनस्यते) लोगों से स्तुति किया जाता। हे (देव) दिव्य गुणकर्मस्वभावयुक्त ईश्वर ! जिससे आप (श्रद्धा) प्रसिद्ध (महान्) महान् (असि) हैं, इसलिये हमको उपासना करने के योग्य हैं।
हे (बट्) सत्य (सूर्य) सूर्य के तुल्य सब के प्रकाशक ! जिससे आप (श्रवसा) यश वा धन से (महान्) बड़े (असि) हो। हे (देव) उत्तम सुख के दाता ! (सत्रा) सत्य के साथ (महान्) बड़े (असि) हो। जिससे आप (देवानाम्) पृथिवी आदि वा विद्वानों के (पुरोहितः) प्रथम से हितकारी (मह्ना) महत्त्व से (असुर्य्यः) प्राणों के लिये हितैषी हुए (अदाभ्यम्) आस्तिकता से रक्षा करने योग्य (विभु) व्यापक (ज्योतिः) प्रकाशस्वरूप हैं, इससे सत्कार के योग्य हैं।
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (ओजसा) सामर्थ्य से (जाते) उत्पन्न हुए और (जनमाने) उत्पन्न होनेवाले जगत् में (सूर्यम्) स्वयं प्रकाशस्वरूप सबके अन्तर्यामी परमेश्वर का (श्रायन्तइव) आश्रय करते हुए के समान (विश्वा) सब (वसूनि) वस्तुओं को (प्रति, दीधिम) प्रकाशित करें और (भागम्, न) सेवने योग्य अपने अंश के तुल्य सेवन करें, वैसे (इत्) ही (इन्द्रस्य) उत्तम ऐश्वर्य के भाग को तुम लोग (भक्षत) सेवन करो ।
हे (देवा) विद्वान् लोगो ! जिस कारण (सूर्य्यस्य) सूर्य्य के (उदिता) उदय होते (अद्य) आज (अंहसः) अपराध से (नः) हमको (निः) निरन्तर बचाओ और (अवद्यात्) निन्दित दुःख से (निः, पिपृत) निरन्तर रक्षा करो (तत्) इससे (मित्रः) मित्र (वरुणः) श्रेष्ठ (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) प्रकाश ये सब हमारा (मामहन्ताम्) सत्कार करें ।
हे मनुष्यो ! जो (हिरण्ययेन रथेन) ज्योतिःस्वरूप रमणीय स्वरूप से (कृष्णेन) आकर्षण से परस्पर सम्बद्ध (रजसा) लोकमात्र के साथ (आ, वर्त्तमानः) अपने भ्रमण की आवृत्ति करता हुआ (भुवनानि) सब लोकों को (पश्यन्) दिखाता हुआ (देवः) प्रकाशमान (सविता) सूर्य्यदेव (अमृतम्) जल वा अविनाशी आकाशादि (च) और (मर्त्यम्) मरणधर्मा प्राणिमात्र को (निवेशयन्) अपने-अपने प्रदेश में स्थापित करता हुआ (आ, याति) उदयास्त समय में आता-जाता है, सो ईश्वर का बनाया सूर्य्यलोक है ।
हे मनुष्यो ! जैसे (पूर्वहूतौ) पूर्वजों ने प्रशंसा किये हुए (सुप्रयाः) सुन्दर प्रकार चलनेवाला (नियुत्वान्) शीघ्रकारी वेगादि गुणोंवाला (वायुः) पवन और (पूषा) सूर्य (एषाम्) इन मनुष्यों के (स्वस्तये) सुख के लिये (प्र, वावृजे) प्रकर्षता से चलता है (विशाम्) प्रजाओं के बीच (विश्पतीव) प्रजारक्षक दो राजाओं के तुल्य (बीरिटे) अन्तरिक्ष में (आ, इयाते) आते-जाते हैं, वैसे (अक्तोः) रात्रि और (उषसः) दिन के (बर्हिः) जल को प्राप्त होते हैं।
हे मनुष्यो ! जैसे हम लोग (इन्द्रवायू) बिजुली पवन (बृहस्पतिम्) बड़े लोकों के रक्षक सूर्य्य (मित्रा) प्राण (अग्निम्) अग्नि (पूषणम्) पुष्टिकारक (भगम्) ऐश्वर्य (आदित्यान्) बारह महीनों और (मारुतम्) वायुसम्बन्धि (गणम्) समूह को जान के उपयोग में लावें, वैसे तुम लोग भी उसका प्रयोग करो ।
हे अध्यापक और उपदेशक विद्वान् लोगो ! जैसे (वरुणः) उदान वायु के तुल्य उत्तम विद्वान् और (मित्रः) प्राण के तुल्य प्रिय मित्र (विश्वाभिः) समग्र (ऊतिभिः) रक्षा आदि क्रियाओं से (प्राविता) रक्षक (भुवत्) होवे, वैसे आप दोनों (नः) हमको (सुराधसः) सुन्दर धन से युक्त (करताम्) कीजिये।
हे (इन्द्र) परमैश्वर्यदातः विद्वन् ! हे (विष्णो) व्यापक ईश्वर ! हे (मरुतः) मनुष्यो ! तथा हे (अश्विना) अध्यापक, उपदेशक लोगो ! तुम सब (सजात्यानाम्) हमारे सहयोगी (एषाम्) इन (नः) हमारे बीच (अधि) स्वामीपन को (इत) प्राप्त होओ ।
हे (अग्ने) विद्याप्रकाशक (इन्द्र) महान् ऐश्वर्यवाले (वरुण) अति श्रेष्ठ (मित्र) मित्र (मारुत) मनुष्यों में वर्त्तमान जन (उत) और (विष्णो) व्यापनशील (देवाः) विद्वान् तुम लोगो ! हमारे लिये (शर्द्धः) शरीर और आत्मा के बल को (प्र, यन्त) देओ (उभा) दोनों (नासत्या) सत्यस्वरूप अध्यापक और उपदेशक (रुद्रः) दुष्टों को रुलानेहारा (ग्नाः) अच्छी शिक्षित वाणी (पूषा) पोषक (भगः) ऐश्वर्यवान् (अध) और इसके अनन्तर (सरस्वती) प्रशस्त ज्ञानवाली स्त्री, ये सब हमारा (जुषन्त) सेवन करें ।
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (ऊतये) रक्षा आदि के लिये (इन्द्राग्नी) संयुक्त बिजुली और अग्नि (मित्रावरुणा) मिले हुए प्राण उदान (अदितिम्) अन्तरिक्ष (पृथिवीम्) भूमि (द्याम्) सूर्य (मरुतः) विचारशील मनुष्यों (पर्वतान्) मेघों वा पहाड़ों (अपः) जलों (विष्णुम्) व्यापक ईश्वर (पूषणम्) पुष्टिकर्त्ता (ब्रह्मणस्पतिम्) ब्रह्माण्ड वा वेद के पालक ईश्वर (भगम्) ऐश्वर्य (शंसम्) प्रशंसा के योग्य (सवितारम्) ऐश्वर्यकारक राजा और (स्वः) सुख की (नु) शीघ्र (हुवे) स्तुति करूँ, वैसे उनकी तुम भी प्रशंसा करो।
हे मनुष्यो ! (यः) जो (पज्रः) संचित धनवाला जन जिनकी (शंसते) प्रशंसा और (स्तुवते) स्तुति करता और जिसने धन को (धायि) धारण किया है, उस और (अस्मान्) हमारी जो (अस्मे) हमारे बीच में (मेहना) धनादि को छोड़ने (रुद्राः) शत्रुओं को रुलाने और (पर्वतासः) उत्सवोंवाले (वृत्रहत्ये) दुष्ट को मारने के लिये (भरहूतौ) संग्राम में बुलाने के विषय में (सजोषा) एकसी प्रीतिवाले (इन्द्रज्येष्ठाः) सभापति राजा जिनमें बड़ा है, ऐसे (देवाः) विद्वान् लोग (अवन्तु) रक्षा करें, वे तुम्हारी भी रक्षा करें।
हे (यजत्राः) सङ्गति करनेहारे (देवाः) विद्वानो ! तुम लोग (अद्य) आज (अर्वाञ्चः) हमारे सम्मुख (भवत) हूजिये अर्थात् हमसे विरुद्ध विमुख मत रहिये (भयमानः) डरता हुआ मैं (वः) तुम्हारे (हार्दि) मनोगत को (आ, व्ययेयम्) अच्छे प्रकार होऊँ (नः) हमको (निजुरः) हिंसक (वृकस्य) चोर वा व्याघ्र के सम्बन्ध से (त्राध्वम्) बचाओ। हे (यजत्राः) विद्वानों का सत्कार करनेवाले लोगो ! तुम (अवपदः) जिसमें गिर पड़ते उस (कर्त्तात्) कूप वा गढ़े से हमारी (त्राध्वम्) रक्षा करो।
हे राजा आदि मनुष्यो ! (अद्य) आज जैसे (विश्वे) सब आप लोग (विश्वे) सब (मरुतः) मरणधर्मा मनुष्य और (विश्वे) सब (समिद्धाः) प्रदीप्त (अग्नयः) अग्नि (ऊती) रक्षण क्रिया से (नः) हमारे रक्षक (भवन्तु) होवें (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोग (अवसा) रक्षा आदि के साथ (नः) हमको (आ, गमन्तु) प्राप्त हों, वैसे (विश्वम्) सब (द्रविणम्) धन और (वाजः) अन्न (अस्मै) इस मनुष्य के लिये (अस्तु) प्राप्त होवे।
हे (विश्वे) सब (देवाः) विद्वान् लोगो ! तुम (ये) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (ये) जो (द्यवि) प्रकाश में (ये) जो (अग्निजिह्वाः) जिह्वा के तुल्य जिनके अग्नि हैं, वे (उत) और (वा) अथवा (यजत्राः) सङ्गति करनेवाले पूजनीय पदार्थ हैं, उनके जाननेवाले (स्थ) हूजिये (मे) मेरे (इमम्) इस (हवम्) पढ़ने-पढ़ाने रूप व्यवहार को (उप, शृणुत) निकट से सुनो (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) सभा वा आसन पर (आसद्य) बैठ कर (मादयध्वम्) आनन्दित होओ ।
हे (सवितः) समस्त जगत् के उत्पादक जगदीश्वर ! (हि) जिससे आप (यज्ञियेभ्यः) यज्ञसिद्धि करनेहारे (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (उत्तमम्) श्रेष्ठ (प्रथमम्) मुख्य (अमृतत्वम्) मोक्षभाव (भागम्) सेवने योग्य सुख को (सुवसि) प्रेरित करते हो (आत्, इत्) इसके अनन्तर ही (दामानम्) सुख देनेवाले प्रकाश और (अनूचीना) जानने के साधन (जीविता) जीवन के हेतु कर्मों को (मानुषेभ्यः) मनुष्यों के लिये (वि, ऊर्णुषे) विस्तृत करते हो, इसलिये उपासना के योग्य हो।
हे (प्रयज्यो) अच्छे प्रकार यज्ञ करनेहारे विद्वन् ! (नियुतः) निश्चयात्मक पुरुषों को (पत्यमानः) प्राप्त होते हुए (कविः) बुद्धिमान् विद्वान् आप जो तुम्हारी (बृहती) बड़ी तेज (मनीषा) बुद्धि है, उससे (बृहद्रयिम्) बहुत धनों के निमित्त (विश्ववारम्) सबको ग्रहण करनेहारे (रथप्राम्) विमानादि यानों को व्याप्त होनेवाले (द्युतद्यामा) अग्नि को प्रदीप्त करनेवाले (वायुम्) प्राणादिस्वरूप वायु और (कविम्) बुद्धिमान् जन का (अच्छ, प्र, इयक्षसि) अच्छे प्रकार सङ्ग करना चाहते हो, इससे सबके सत्कार के योग्य हो।
हे (इन्द्रवायू) बिजुली और पवन की विद्या को जाननेवाले विद्वानो ! तुम्हारे लिये (इमे) ये (सुताः) सिद्ध किये हुए पदार्थ हैं (हि) जिस कारण (इन्दवः) सोमादि ओषधियों के रस (वाम्) तुमको (उशन्ति) चाहते अर्थात् वे तुम्हारे योग्य हैं, इससे (प्रयोभिः) उत्तम गुण, कर्म, स्वभावों के सहित उनको (उप, आ, गतम्) निकट से अच्छे प्रकार प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! जैसे मैं (धियम्) बुद्धि तथा (घृताचीम्) शीतलतारूप जल को प्राप्त होनेवाली रात्रि को (साधन्ता) सिद्ध करते हुए (पूतदक्षम्) शुद्ध बलयुक्त (मित्रम्) मित्र (च) और (रिशादसम्) दुष्ट हिंसक को मारनेहारे (वरुणम्) धर्मात्मा जन को (हुवे) स्वीकार करता हूँ, वैसे इनको तुम लोग भी स्वीकार करो।
हे (नासत्या) असत्य आचरण से पृथक् (रुद्रवर्त्तनी) दुष्टरोदक न्यायाधीश के तुल्य आचरणवाले (दस्रा) दुष्टों के निवारक विद्वानो ! जो (वृक्तबर्हिषः) यज्ञ से पृथक् अर्थात् भोजनार्थ (युवाकवः) तुमको चाहनेवाले (सुताः) सिद्ध किये पदार्थ हैं, उनको तुम लोग (आ, यातम्) अच्छे प्रकार प्राप्त हो।
(यदि) जो (सरमा) पति के अनुकूल रमण करनेहारी (प्रथमा) प्रख्यात (सुपदी) सुन्दर पगोंवाली (अक्षराणाम्) अकारादि वर्णों में (रवम्) बोलने को (जानती) जानती हुई (रुग्णम्) रोगी प्राणी को (विदत्) जाने (अग्रम्) आगे (नयत्) पहुँचानेवाला (सध्र्यक्) साथ प्राप्त होता (पूर्व्यम्) प्रथम के लोगों ने प्राप्त किये (महि) महागुणयुक्त (अद्रेः) मेघ से उत्पन्न हुए (पाथः) अन्न को (कः) करे अर्थात् भोजनार्थ सिद्ध करे और पति को (अच्छ) अच्छे प्रकार (गात्) प्राप्त होवे तो वह सुख को पावे।
जो (अमृताः) आत्मस्वरूप से मरणधर्मरहित (देवाः) विद्वान् लोग (अमर्त्यम्) नित्य व्यापकरूप (वैश्वानरम्) सबके चलानेवाले (एनम्) इस अग्नि को (क्षैत्रजित्याय) जिस क्रिया से खेतों को जोतते उस भूमि राज्य के होने के लिये (आ, अवृधन्) अच्छे प्रकार बढ़ाते हैं, वे (ईम्) सब ओर से (अस्मात्) इस (वैश्वानरात्) सब मनुष्यों के हितकारी (अग्नेः) अग्नि से (पुर एतारम्) पहिले पहुँचानेवाले (अन्यम्) भिन्न किसी को (स्पशम्) दूत (नहि) नहीं (अविदन्) जानते हैं।
हे मनुष्यो ! हम जिन (उग्रा) अधिक बली तेजस्वी स्वभाववाले (मृधः) और हिंसकों को (विघनिना) विशेष कर मारनेहारे (इन्द्राग्नी) सभा-सेनापति को (हवामहे) बुलाते हैं (ता) वे (ईदृशे) इस प्रकार के संग्रामादि व्यवहार में (नः) हम लोगों को (मृडातः) सुखी करते हैं।
हे (नरः) नायक अध्यापकादि लोगो ! तुम लोग (देवान्) विद्वानों को (अभि) सब ओर से (इयक्षते) सत्कार करना चाहते हुए (अस्मै) इस (पवमानाय) पवित्र करनेहारे (इन्दवे) कोमल विद्यार्थी के लिये (उपगायत) निकटस्थ हो के शास्त्रों को पढ़ाया करो ।
हे (मघवन्) उत्तम पूजित धनवाले सेनापति ! (ये) जो (विप्राः) बुद्धिमान् लोग (अहिहत्ये) जहाँ मेघ का काटना और (गविष्ठौ) किरणों की संगति हो, उस संग्राम में जैसे किरणें सूर्य के तेज को वैसे (त्वा) आपको (अवर्द्धन्) उत्साहित करें। हे (हरिवः) प्रशंसित किरणों के तुल्य चिलकते घोड़ोंवाले शूरवीर जन ! (ये) जो लोग (शाम्बरे) मेघ-सूर्य के संग्राम में बिजुली के तुल्य (त्वा) आपको बढ़ावें (ये) जो (नूनम्) निश्चय कर आपकी (अनुमदन्ति) अनूकूलता से आनन्दित होते हैं और (ये) जो आपकी रक्षा करते हैं। हे (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्यवाले जन ! (मरुद्भिः) जैसे वायु के (सगणः) गण के साथ सूर्य रस को ग्रहण करे, वैसे रस को ग्रहण करे, वैसे मनुष्यों के साथ (सोमम्) श्रेष्ठ ओषधि रस को (पिब) पीजिये ।
हे राजन् ! (धनिष्ठा) अत्यन्त धनवती (माता) (यत्) जिस (वीरम्) शूरतादि गुणयुक्त आप पुत्र को (दधनत्) पुष्ट करती रही और (चित्) जैसे (इन्द्रम्) सूर्य्य को (मरुतः) वायु बढ़ावे, वैसे सभासद् लोग जिस आपको (अवर्द्धन्) योग्यतादि से बढ़ावें सो आप (अत्र) इस राज्यपालनरूप व्यवहार में (सहसे) बल और (तुराय) शीघ्रता के लिये (उग्रः) तेजस्वि स्वभाववाले (मन्द्रः) स्तुति प्रशंसा को प्राप्त आनन्ददाता (ओजिष्ठः) अतिशय पराक्रमी और (बहुलाभिमानः) अनेक प्रकार के पदार्थों के अभिमानवाले हुए सुख को (जनिष्ठाः) उत्पन्न कीजिये।
हे (वृत्रहन्) शत्रुओं के विनाशक (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्यवाले राजन् ! आप (अस्माकम्) हम लोगों की (अर्द्धम्) वृद्धि उन्नति को (आ, गहि) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये और (महान्) अत्यन्त पूजनीय हुए (महीभिः) बड़ी (ऊतिभिः) रक्षादि क्रियाओं से (नः) हमको (तु, आ, दधनत्) शीघ्र अच्छे प्रकार पुष्ट कीजिये ।
हे (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्य देनेवाले राजन् ! जिस कारण (त्वम्) आप (प्रतूर्तिषु) जिसमें मारना होता उन संग्रामों में (विश्वाः) शत्रुओं की सब (स्पृधः) ईर्ष्यायुक्त सेनाओं को (अभि, असि) तिरस्कार करते हो तथा (अशस्तिहा) जिनकी कोई प्रशंसा न करे, उन दुष्टों के हन्ता (जनिता) सुखों के उत्पन्न करनेहारे (विश्वतूः) सब शत्रुओं को मारनेवाले हुए (त्वम्) आप विजयवाले (असि) हो, इससे (तरुष्यतः) हनन करनेवाले शत्रुओं को (तूर्य्य) मारिये ।
हे (इन्द्र) शत्रुओं के नाशक राजन् ! जिस (ते) आपके (तुरयन्तम्) शत्रुओं को मारते हुए (शुष्मम्) शत्रुओं को सुखानेहारे बल को (शिशुम्) बालक को (मातरा) माता-पिता (न) के समान (क्षोणी) अपनी पराई भूमि (अनु, ईयतुः) अनुकूल प्राप्त होती उस (ते) आपके (मन्यवे) क्रोध से (विश्वाः, स्पृधः) सब शत्रुओं की ईर्ष्या करनेहारी सेना (श्नथयन्त) नष्ट-भ्रष्ट मारी जाती हैं (यत्) जिस (वृत्रम्) न्याय के निरोधक शत्रु को आप (तूर्वसि) मारते हो, वह पराजित हो जाता है ।
हे (आदित्यासः) सूर्यवत् तेजस्वी पूर्णविद्यावाले लोगो ! जैसे (देवानाम्) विद्वानों का (यज्ञः) संगति के योग्य संग्रामादि व्यवहार (सुम्नम्) सुख करने को (प्रत्येति) उलटा प्राप्त होता है, वैसे (मृडयन्तः) सुखी करनेवाले (भवत) होवो। जैसे (वः) तुम्हारी (वरिवोवित्तरा) अत्यन्त सेवा को प्राप्त (अर्वाची) हमारे अनुकूल (सुमतिः) उत्तम बुद्धि (आ, ववृत्यात्) अच्छे प्रकार वर्त्ते (अंहोः) अपराधी की (चित्) भी वैसे सुख करनेवाली हमारे अनुकूल बुद्धि (असत्) होवे।
हे (सवितः) अनेक पदार्थों के उत्पादक तेजस्वि विद्वन् राजन् ! (त्वम्) आप (अदब्धेभिः) अहिंसित (शिवेभिः) कल्याणकारी (पायुभिः) रक्षाओं से (अद्य) आज (नः) हमारे (गयम्) प्रशंसा के योग्य सन्तान, धन और घर की (परि, पाहि) सब ओर से रक्षा कीजिये (हिरण्यजिह्वः) सबके हित में रमण करने योग्य वाणीवाले हुए आप (नव्यसे) अत्यन्त नवीन (सुविताय) ऐश्वर्य के लिये (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कीजिये, जिससे (अघशंसः) पाप की प्रशंसा करनेवाला दुष्ट चोर हम पर (माकिः) न (ईशत्) समर्थ होवे।
हे राजा प्रजा जनो ! जो (वाम्) तुम दोनों के (मधुमन्तः) प्रशंसित ज्ञानयुक्त (सुतासः) विद्या और उत्तम शिक्षा से सिद्ध किये गये (शुचयः) पवित्र मनुष्य (अध्वर्युभिः) हिंसा और अन्याय से पृथक् रहनेवाले के साथ (वीरया) वीर पुरुषों से युक्त सेना में शत्रुओं को (प्र, दद्रिरे) अच्छे प्रकार विदीर्ण करते हैं, उनके साथ हे (वायो) वायु के सदृश वर्त्तमान बलिष्ठ राजन् ! आप (नियुतः) निरन्तर संयुक्त-वियुक्त होनेवाले वायु आदि गुणों को (वह) प्राप्त कीजिये। और (अच्छा, याहि) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये तथा (मदाय) आनन्द के लिये (सुतस्य) सिद्ध किये हुए (अन्धसः) अन्न के रस को (पिब) पीजिये ।
हे मनु्ष्यो ! जैसे (रप्सुदा) सुन्दर रूप देनेवाले (उभा) दोनों (कर्णा) कार्यसाधक (हिरण्यया) ज्योतिःस्वरूप (मही) महत्परिमाणवाले सूर्य-पृथिवी (यज्ञस्य) संगत संसार के (अवतम्) कूप के तुल्य रक्षा करनेवाले होते और (गावः) किरण भी रक्षक होवें, वैसे इनकी तुम लोग (उप, अवत) रक्षा करो ।
हे (रिशादसा) अविद्यादि दोषों के नाशक अध्यापक उपदेशक लोगो ! (काव्ययोः) कवि विद्वानों ने बनाये व्यवहार परमार्थ के प्रतिपादक ग्रन्थों के (आजानेषु) जिनसे विद्वान् होते उन पठन-पाठनादि व्यवहारों में (क्रत्वा) बुद्धि से वा कर्म करके (दक्षस्य) कुशल पुरुष के (सधस्थे) जिसमें साथ मिल कर बैठें, उस (दुरोणे) घर में तुम लोग (आ) आया करो।
हे (दैव्यौ) विद्वानों में कुशल प्रवीण (अध्वर्यू) अपने आत्मा को अहिंसा धर्म चाहते हुए विद्वानो ! तुम दोनों (सूर्यत्वचा) सूर्य के तुल्य कान्तिवाले (रथेन) आनन्द के हेतु यान से (आ, गतम्) आया करो और आकर (मध्वा) मधुर भाषण से (यज्ञम्) चलने रूप व्यवहार को (सम्, अञ्जाथे) सम्यक् प्रकट करो ।
हे मनुष्यो ! (एषाम्) इन विद्युत् और सूर्य आदि की (तिरश्चीनः) तिरछे गमनवाली (विततः) विस्तारयुक्त (रश्मिः) किरण वा दीप्ति (अधः) नीचे (स्वित्) भी (आसीत्) है (उपरि) ऊपर (स्वित्) भी (आसीत्) है तथा (अवस्तात्) इधर से और (परस्तात्) उधर से (प्रयतिः) प्रयतनवाली है, उसके विज्ञान से (रेतोधाः) पराक्रम को धारण करनेवाले (आसन्) हों तथा (महिमानः) पूज्य और (स्वधा) अपने धनादि पदार्थ के धारक होते हुए आप लोग उपकारी (आसन्) हूजिये ।
हे मनुष्यो ! (यत्) जो विद्युत् रूप अग्नि (रोदसी) सूर्य-पृथिवी और (महत्) महान् (जातम्) प्रसिद्ध (स्वः) अन्तरिक्ष को (आ, अपृणत्) अच्छे प्रकार व्याप्त होता (एनम्) इस अग्नि को (अपसः) कर्म (आ, अधारयन्) अच्छे प्रकार धारण करते तथा जो (कविः) शब्द होने का हेतु अग्नि (अध्वराय) अहिंसा नामक शिल्पविद्या रूप यज्ञ के तथा (वाजसातये) वेग के सम्यक् सेवन के लिये (अत्यः) मार्ग को व्याप्त होनेवाले घोड़े के (नः) समान विद्वानों ने (परि, नीयते) प्राप्त किया है, (सः) वह (चनोहितः) पृथिवी आदि अन्न के लिये हितकारी है, ऐसा तुम लोग जानो।
(या) जो (मन्दाना) आनन्द देनेवाले (वृत्रहन्तमा) धर्म का निरोध करनेहारे पापियों के नाशक सभा सेनापति के (चित्) समान (गिरा) वाणी (आङ्गूषैः) अच्छे घोष और (उक्थेभिः) प्रशंसा योग्य स्तुतियों के साधक वेद के भागरूप मन्त्रों से शिल्प विज्ञान का (आविवासतः) अच्छे प्रकार सेवन करते हैं, उन अध्यापक उपदेशकों की मनुष्यों को (आ) अच्छे प्रकार सेवा करनी चाहिये ।
(ये) जो (नः) हमारे (सूनवः) सन्तान (अमृतस्य) नाशरहित परमेश्वर के सम्बन्ध की वा नित्य वेद की (गिरः) वाणियों को (उप, शृण्वन्तु) अध्यापकादि के निकट सुनें वे (नः) हमारे लिये (सुमृडीकाः) उत्तम सुख करनेहारे (भवन्तु) होवें।
(सुतासः) विद्या और सुन्दर शिक्षा से युक्त ऐश्वर्यवाले (मतयः) बुद्धिमान् लोग (मे) मेरे लिये जिन (ब्रह्माणि) धनों की (प्रति, हर्यन्ति) प्रतीति से कामना करते और (इमा) इन (उक्था) प्रशंसा के योग्य वेदवचनों की (आ, शासते) अभिलाषा करते हैं और (शुष्मः) बलकारी (प्रभृतः) अच्छे प्रकार हवनादि से पुष्ट किया (अद्रिः) मेघ (मे) मेरे लिये जिस (शम्) सुख को (इयर्त्ति) पहुँचाता (ता) उनको (नः) हमारे लिये (हरी) हरणशील अध्यापक और अध्येता (अच्छा, वहतः) अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं।
हे (प्रवृद्ध) सबसे श्रेष्ठ सर्वपूज्य (मघवन्) बहुत धनवाले ईश्वर जिस (ते) आपका (अनुत्तम्) अप्रेरित स्वरूप है (त्वावान्) आपके सदृश (देवता) पूज्य इष्टदेव (विदानः) विद्वान् (नु) निश्चय से कोई (न) नहीं (अस्ति) है, आप (जायमानः) उत्पन्न होनेवाले (न) नहीं और (जातः) उत्पन्न हुए भी (न) नहीं हैं, (यानि) जिन जगत् की उत्पत्ति आदि कर्मों को (करिष्या) करोगे तथा (कृणहि) करते हो, उनको कोई भी (नकिः) नहीं (आ, नशते) स्मरणशक्ति से व्याप्त होता, सो आप सबके उपास्य देव हो।
हे मनुष्यो ! (यतः) जिससे (उग्रः) तेज स्वभाववाला (त्वेषनृम्णः) सुन्दर प्रकाशित धन से युक्त वीर पुरुष (जज्ञे) उत्पन्न हुआ, जो (जज्ञानः) उत्पन्न हुआ (शत्रून्) शत्रुओं को (सद्यः) शीघ्र (निरिणाति) निरन्तर मारता है, (विश्वे) सब (ऊमाः) रक्षादि कर्म करनेवाले लोग (यम्) जिसके (अनु) पीछे (मदन्ति) आनन्द करते हैं, (तत्, इत्) वही ब्रह्म परमात्मा (भुवनेषु) लोक-लोकान्तरों में (ज्येष्ठम्) सबसे बड़ा, मान्य और श्रेष्ठ (आस) है, ऐसा तुम जानो।
हे (पुरूवसो) बहुत पदार्थों में वास करनेहारे परमात्मन् ! (याः) जो (इमाः) ये (मम) मेरी (गिरः) वाणी (त्वा) आपको (उ) निश्चय कर (वर्द्धन्तु) बढ़ावें, उनको प्राप्त होके (पावकवर्णाः) अग्नि के तुल्य वर्णवाले तेजस्वी (शुचयः) पवित्र हुए (विपश्चितः) विद्वान् लोग (स्तोमैः) पदार्थविद्याओं की प्रशंसाओं से (अभि, अनूषत) सब ओर से प्रशंसा करें।
हे राजन् ! (यस्य) जिस आपको (अयम्) यह (विश्वः) सब (आर्य्यः) धर्मयुक्त गुण, कर्म स्वभाववाला पुरुष (दासः) सेवकवत् आज्ञाकारी (शेवधिपाः) धरोहर धन का रक्षक अर्थात् धर्मादि कार्य वा राजकर देने में व्यय करनेहारा जन (अरिः) और शत्रु (पवीरवि) धनादि की रक्षा के लिये शस्त्र को प्राप्त होनेवाला (रुशमे) हिंसक व्यवहार वा (अर्य्ये) धनस्वामी वैश्य आदि के निमित्त (तिरः) छिपनेवाला (चित्) भी (तुभ्य) आपके लिये (इत्) निश्चय से है (सः) वह आप (रयिः) धन के समान (अज्यते) प्राप्त होते हैं ।
हे मनुष्यो ! जो (अयम्) यह सभापति राजा (ऋषिभिः) वेदार्थवेत्ता राजर्षियों के साथ (सहस्रम्) असंख्य प्रकार के ज्ञान को प्राप्त (सहस्कृतः) बल से संयुक्त (सत्यः) और श्रेष्ठ व्यवहारों वा विद्वानों में उत्तम चतुर है (अस्य) इसका (महिमा) महत्त्व (समुद्रइव) समुद्र वा अन्तरिक्ष के तुल्य (पप्रथे) प्रसिद्ध होता है तो (सः) वह पूर्वोक्त मैं प्रजाजन इस राजा के (यज्ञेषु) संगत राजकार्यों और (विप्रराज्ये) बुद्धिमानों के राज्य में (शवः) बल की (गृणे) स्तुति करता हूँ।
हे (सवितः) समग्र ऐश्वर्य से युक्त राजन् ! (त्वम्) आप (अद्य) आज (अदब्धेभिः) न बिगाड़ने योग्य (शिवेभिः) मङ्गलकारी (पायुभिः) अनेक प्रकार के रक्षा के उपायों से (नः) हमारी (गयम्) प्रजा की (परि, पाहि) सब ओर से रक्षा कीजिये (हिरण्यजिह्वः) सबके हित में रमण करने योग्य वाणी से युक्त हुए (नव्यसे) अतिशय कर नवीन (सुविताय) ऐश्वर्य के अर्थ (नः) हमारी (रक्ष) रक्षा कीजिये, जिससे (अघशंसः) दुष्ट चोर हम पर (माकिः) न (ईशत) समर्थ वा शासक हो ।
हे (वायो) वायु के तुल्य वर्त्तमान राजन् ! जैसे मैं (अन्तः) अन्तःकरण में (पवित्रः) शुद्धात्मा (उपरि) उन्नति में (श्रीणानः) आश्रय करता हुआ (अयम्) यह (शुक्रः) शीघ्रकारी पराक्रमी हुआ (सुमन्मभिः) सुन्दर विज्ञानों से (ते) आपके (दिविस्पृशम्) विद्याप्रकाशयुक्त (यज्ञम्) संगत व्यवहार को (अयामि) प्राप्त होता हूँ, वैसे आप (नः) हमारे विद्याप्रकाशयुक्त उत्तम व्यवहार को (आ, याहि) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये।
हम लोग जिन (सुसन्दृशा) सुन्दर प्रकार से सम्यक् देखनेवाले (सुहवा) सुन्दर बुलाने योग्य (इन्द्रवायू) राजप्रजाजनों को (इह) इस जगत् में (हवामहे) स्वीकार करते हैं (यथा) जैसे (सङ्गमे) संग्राम वा समागम में (नः) हमारे (सर्वः, इत्) सभी (जनः) मनुष्य (अनमीवः) नीरोग (सुमनाः) प्रसन्न चित्तवाले (असत्) होवें, वैसे किया करें ।
(यः) जो (देवतातये) विद्वानों वा दिव्यगुणों के लिये (ऋधक्) समृद्धिमान् (मर्त्यः) मनुष्य (अभिष्टये) अभीष्ट सुख की प्राप्ति के अर्थ तथा (हव्यदातये) ग्रहण करने योग्य पदाथों की प्राप्ति के लिये (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान के तुल्य राजा प्रजाजनों का (नूनम्) निश्चय (आचक्रे) सेवन करता (सः) वह जन (इत्था) इस उक्त हेतु से (शशमे) शान्त उपद्रवरहित होता है ।
हे (वृषणा) पराक्रमवाले (जेन्यावसू) जयशीलजनों को बसानेवाले वा जीतने योग्य अथवा जीता है धन जिन्होंने ऐसे (अश्विना) विद्यादि शुभ गुणों में व्याप्त राजप्रजाजन तुम दोनों सुख को (आ, यातम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ, प्रजाओं को (उप, भूषतम्) सुशोभित करो, (मध्वः) वैद्यकशास्र की रीति से सिद्ध किये मधुर रस को (पिबतम्) पीओ, (पयः) जल को (दुग्धम्) पूर्ण करो अर्थात् कोई जल विना दुःखी न रहे। (नः) हमको (मा) मत (मर्धिष्टम्) मारो और धर्म से विजय को (आ, गतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होओ ।
हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे (नः) हमको (ब्रह्मणस्पतिः) धन वा वेद का रक्षक अधिष्ठाता विद्वान् (प्र, एतु) प्राप्त होवे (सूनृता) सत्य लक्षणों से उज्ज्वल (देवी) शुभ गुणों से प्रकाशमान वाणी (प्र, एतु) प्राप्त हो (नर्य्यम्) मनुष्यों में उत्तम (पङ्क्तिराधसम्) समूह की सिद्धि करनेहारे (यज्ञम्) सङ्गत धर्मयुक्त व्यवहारकर्त्ता (वीरम्) शूरवीर पुरुष को (देवाः) विद्वान् लोग (अच्छ, नयन्तु) अच्छे प्रकार प्राप्त करें, वैसे हमको प्राप्त होओ ।
हे मनुष्यो ! तुम लोग जैसे (सुपर्णः) सुन्दर चालों से युक्त (चन्द्रमाः) शीतकारी चन्द्रमा (कनिक्रदत्) शीघ्र शब्द करते हींसते हुए (हरिः) घोड़ों के तुल्य (दिवि) सूर्य के प्रकाश में (अप्सु) अन्तरिक्ष के (अन्तः) बीच (आ, धावते) अच्छे प्रकार शीघ्र चलता है और (पुरुस्पृहम्) बहुतों से चाहने योग्य (बहुलम्) बहुत (पिशङ्गम्) सुवर्णादि के तुल्य वर्णयुक्त (रयिम्) शोभा कान्ति को (एति) प्राप्त होता है, वैसे पुरुषार्थी हुए वेग से लक्ष्मी को प्राप्त होओ।
हे मनुष्यो ! (देव्या) प्रकाशमान (धिया) बुद्धि वा कर्म से (गृणन्तः) स्तुति करते हुए हम लोग जैसे (वः) तुम्हारे (अवसे) रक्षादि के लिये (देवन्देवम्) विद्वान्-विद्वान् वा उत्तम पदार्थ को (हुवेम) बुलावें वा ग्रहण करें तुम्हारे (अभिष्टये) अभीष्ट सुख के लिये (देवन्देवम्) विद्वान्-विद्वान् वा उत्तम प्रत्येक पदार्थ को तथा तुम्हारे (वाजसातये) वेगादि के सम्यक् सेवन के लिये (देवन्देवम्) विद्वान्-विद्वान् वा उत्तम प्रत्येक पदार्थ को बुलावें वा स्वीकार करें, वैसे तुम लोग भी ऐसा हमारे लिये करो ।
हे विद्वान् मनुष्यो ! जैसे (दिवि) आकाश में (पृष्टः) स्थित (वैश्वानरः) सब मनुष्यों का हितकारी (क्ष्मया) पृथिवी के साथ (वृधानः) बढ़ा हुआ (ओजसा) बल से (बृहन्) महान् (चनोहितः) ओषधियों को पकाने रूप सामर्थ्य से अन्नादि का धारण (अग्निः) सूर्यरूप अग्नि (ज्योतिषा) अपने प्रकाश से (तमः) रात्रिरूप अन्धकार को (बाधते) निवृत्त करता और (अरोचत) प्रकाशित होता है, वैसे उत्तम गुणों से अविद्यारूप अन्धकार को निवृत्त करके तुम लोग भी प्रकाशित कीर्तिवाले होओ ।
हे (इन्द्राग्नी) अध्यापक उपदेशक लोगो ! जो (इयम्) यह (अपात्) विना पग की (पद्वतीभ्यः) बहुत पगोंवाली प्रजाओं से (पूर्वा) प्रथम उत्पन्न होनेवाली (आ, अगात्) आती है (शिरः) शिर को (हित्वी) छोड़ के अर्थात् विना शिर की हुई प्राणियों की (जिह्वया) वाणी से (वावदत्) शीघ्र बोलती अर्थात् कुक्कुट आदि के बोल से उषःकाल की प्रतीति होती है, इससे बोलना धर्म उषा में आरोपण किया जाता है (चरत्) विचरती है और (त्रिंशत्) तीस (पदा) प्राप्ति के साधन मुहूर्तों को (नि, अक्रमीत्) निरन्तर आक्रमण करती है, वह उषा प्रातः की वेला तुम लोगों को जाननी चाहिये।
हे मनुष्यो ! जो (सरातयः) बराबर दाता (समन्यवः) तुल्य क्रोधवाले (विश्वे) सब (देवासः) विद्वान् लोग (साकम्) साथ मिल के (अद्य) आज (नः) हमारे (मनवे) मनुष्य के लिये (स्म) प्रसिद्ध (वरिवोविदः) सत्कार के जानने वा धन के प्राप्त करानेवाले (भवन्तु) हों (तु) और (ते) वे (अपरम्) भविष्यत् काल में (नः) हमारे (तुचे) पुत्र-पौत्रादि सन्तान के अर्थ हमारे लिये सत्कार के जानने वा धन के प्राप्त करानेवाले हों (ते, हि) वे ही तुम लोगों के लिये भी सत्कार के जानने वा धन के प्राप्त करानेवाले हों ।
हे (बृहद्भानो) महान् किरणों के तुल्य प्रकाशित कीर्तिवाले (मरुद्गण) मनुष्यों वा पवनों के समूह से कार्य्यसाधक (इन्द्र) परमैश्वर्य्य के देनेवाले सभापति राजा (देवाः) विद्वान् लोग (ते) आपकी (सख्याय) मित्रता के अर्थ (येमिरे) संयम करते हैं। (अथ) और (द्युम्नी) बहुत प्रशंसारूप धन से युक्त (इन्द्रः) परमैश्वर्यवाले आप (अभिशस्तीः) सबसे हिंसाओ को (अप, आ, अधमत्) दूर धमकाते हो (अशस्तिहा) दुष्टों के नाशक (अभवत्) हूजिये ।
हे (मरुतः) मनुष्यो ! जो (शतक्रतुः) असंख्य प्रकार की बुद्धि वा कर्मोंवाला सेनापति (शतपर्वणा) जिससे असंख्य जीवों का पालन हो ऐसे (वज्रेण) शस्त्र-अस्त्र से (वृत्रहा) जैसे मेघहन्ता सूर्य (वृत्रम्) मेघ को वैसे (बृहते) बड़े (इन्द्राय) परमैश्वर्य के लिये शत्रुओं को (हनति) मारता और (वः) तुम्हारे लिये (ब्रह्म) धन वा अन्न को प्राप्त करता है, उसका तुम लोग (प्र, अर्चत) सत्कार करो ।
हे मनुष्यो ! जो (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य्ययुक्त राजा (विष्णवि) व्यापक परमात्मा में (सुतस्य) उत्पन्न हुए (अस्य) इस संसार के (मदे) आनन्द के लिये (वृष्ण्यम्) पराक्रम (शवः) बल तथा जल को (अद्य) इस वर्त्तमान समय में (वावृधे) बढ़ाता है (अस्य) इस परमात्मा के (इत्) ही (महिमानम्) महिमा को (पूर्वथा) पूर्वज लोगों के तुल्य (आयवः) अपने कर्मफलों को प्राप्त होनेवाले मनुष्य लोग (अनु, स्तुवन्ति) अनुकूल स्तुति करते हैं, (तम्) उसकी तुम लोग भी स्तुति करो।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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