हे (इन्द्र) उत्तम ऐश्वर्य देनेवाले राजन् ! जिस कारण (त्वम्) आप (प्रतूर्तिषु) जिसमें मारना होता उन संग्रामों में (विश्वाः) शत्रुओं की सब (स्पृधः) ईर्ष्यायुक्त सेनाओं को (अभि, असि) तिरस्कार करते हो तथा (अशस्तिहा) जिनकी कोई प्रशंसा न करे, उन दुष्टों के हन्ता (जनिता) सुखों के उत्पन्न करनेहारे (विश्वतूः) सब शत्रुओं को मारनेवाले हुए (त्वम्) आप विजयवाले (असि) हो, इससे (तरुष्यतः) हनन करनेवाले शत्रुओं को (तूर्य्य) मारिये ।
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