हे मनुष्यो ! (यः) जो (पज्रः) संचित धनवाला जन जिनकी (शंसते) प्रशंसा और (स्तुवते) स्तुति करता और जिसने धन को (धायि) धारण किया है, उस और (अस्मान्) हमारी जो (अस्मे) हमारे बीच में (मेहना) धनादि को छोड़ने (रुद्राः) शत्रुओं को रुलाने और (पर्वतासः) उत्सवोंवाले (वृत्रहत्ये) दुष्ट को मारने के लिये (भरहूतौ) संग्राम में बुलाने के विषय में (सजोषा) एकसी प्रीतिवाले (इन्द्रज्येष्ठाः) सभापति राजा जिनमें बड़ा है, ऐसे (देवाः) विद्वान् लोग (अवन्तु) रक्षा करें, वे तुम्हारी भी रक्षा करें।
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