ऋध॑गि॒त्था स मर्त्यः॑ शश॒मे दे॒वता॑तये। यो नू॒नं मि॒त्रावरु॑णाव॒भिष्ट॑यऽआच॒क्रे ह॒व्यदा॑तये ॥
(यः) जो (देवतातये) विद्वानों वा दिव्यगुणों के लिये (ऋधक्) समृद्धिमान् (मर्त्यः) मनुष्य (अभिष्टये) अभीष्ट सुख की प्राप्ति के अर्थ तथा (हव्यदातये) ग्रहण करने योग्य पदाथों की प्राप्ति के लिये (मित्रावरुणौ) प्राण और उदान के तुल्य राजा प्रजाजनों का (नूनम्) निश्चय (आचक्रे) सेवन करता (सः) वह जन (इत्था) इस उक्त हेतु से (शशमे) शान्त उपद्रवरहित होता है ।
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