यु॒क्ष्वा हि दे॑व॒हूत॑माँ॒२ऽअश्वाँ॑२ऽअग्ने र॒थीरि॑व। नि होता॑ पू॒र्व्यः स॑दः ॥
हे (अग्ने) विद्वन् ! आप (रथीरिव) सारथि के समान (देवहूतमान्) विद्वानों से अत्यन्त स्तुति किये हुए (अश्वान्) शीघ्रगामी अग्नि आदि वा घोड़ों को (युक्ष्व) युक्त कीजिये (पूर्व्यः) पूर्वज विद्वानों से विद्या को प्राप्त (होता) ग्रहण करते हुए (हि) निश्चय कर (नि, सदः) स्थिर हूजिये।
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