हे मनुष्यो ! जैसे (स्वर्थे) सुन्दर प्रयोजनवाली (द्वे) दो (विरूपे) भिन्न-भिन्न रूप की स्त्रियाँ (चरतः) भोजनादि आचरण करती हैं और (अन्यान्या) एक-एक अलग-अलग समय में (वत्सम्) निरन्तर बोलनेवाले एक बालक को (उप, धापयेते) निकट कर दूध पिलाती हैं, उन दोनों में से (अन्यस्याम्) एक में (स्वधावान्) प्रशस्त शान्ति आदि अमृत तुल्य गुणयुक्त (हरिः) मन को हरनेवाला पुत्र (भवति) होता और (शुक्रः) शीघ्रकारी (सुवर्चाः) सुन्दर तेजस्वी (अन्यस्याम्) दूसरी में हुआ (ददृशे) दीख पड़ता है, वैसे ही सुन्दर प्रयोजनवाले दो काले-श्वेत भिन्न रूपवाले रात्रि-दिन वर्त्तमान हैं और एक-एक भिन्न-भिन्न समय में एक संसाररूप बालक को दुग्धादि पिलाते हैं, उन दोनों में से एक रात्रि में अमृतरूप गुणोंवाला मन का प्रसादक चन्द्रमा उत्पन्न होता और द्वितीय दिनरूप वेला में पवित्रकर्त्ता सुन्दर तेजवाला सूर्यरूप पुत्र दीख पड़ता है, ऐसा तुम लोग जानो।
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