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अध्याय 1 — प्रथमोऽध्यायः

श्वेताश्वतर
15 श्लोक • केवल अनुवाद
ॐ — ब्रह्मवादी (ब्रह्म के ज्ञाता) कहते हैं— ‘ब्रह्म का कारण क्या है? हम किससे उत्पन्न हुए हैं? हम किसके द्वारा जीवित रहते हैं और कहाँ स्थित हैं? हम किसके अधीन होकर सुख और दुःख में स्थित रहते हैं? —हे ब्रह्मविद्! इस व्यवस्था को समझाइए।’
काल, प्रकृति, नियति, यदृच्छा, जड़-पदार्थ, प्राणी इनमें से कोई या इनका संयोग भी कारण नहीं हो सकता क्योंकि इनका भी अपना जन्म होता है, अपनी पहचान है और अपना अस्तित्व है। जीवात्मा भी कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह भी सुख-दुःख से मुक्त नहीं है।
तब ऋषियों ने एकाग्रचित्त होकर ध्यान योग में स्वयं भगवान की सृजन-शक्ति को देखा जो अपने गुणों में छिपी हुई थी। ये वही एकमेवाद्वितीय हैं जो काल, आत्मा तथा सभी कारणों के अधिपति हैं।
ऋषियों ने एक चक्र या पहिया देखा जिसमें एक नेमि है, तीन वृत्त हैं, सोलह सिरे या अन्त-भाग हैं, पचास अरें हैं, बीस प्रत्यरे हैं, छः अष्टक हैं, भिन्न-भिन्न रूपों का एक पाश है जिसके द्वारा तीन भिन्न-भिन्न मार्गों पर वह चालित होता है तथा उसके मोह के दो निमित्त हैं।
अथवा हम ब्रह्म को ध्यान में एक नदी के रूप में देखते हैं जिसमें पाँच स्रोतों का जल है। पाँच कारणों से उसमें पाँच उग्र घुमाव हैं। इसमें पाँच प्राण रूपी लहरें हैं। उसका मन पंचविध ज्ञान का मूल उद्गम है। पंचविध दुःख इसकी क्षीप्तिकाएं हैं जिनमें पांच भंवर हैं, पांच शाखाएं और असंख्य पक्ष हैं।
उस ब्रह्म चक्र में जो सबका जीवन और आश्रय है हंस (यात्री जीवात्मा) भ्रमण कर रहा है। जब वह अपनी वैयष्टिक आत्मा (जीवात्मा) को पृथक् कर अपने स्वयं को प्रेरक शक्ति (परमात्मा) के रूप में अनुभव करने लगता है तब वह उसकी कृपा से अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
उपनिषदों में स्पष्ट रूप से परम ब्रह्म की घोषणा की गयी है। यह त्रिपक्षीय है। यह सुदृढ़ आश्रय तथा अविनाशी है। इसके आन्तरिक सारतत्व को जानकर वेदज्ञ ऋषि उसमें लीन हो गये और जन्म से मुक्त हो गये।
नाशवान और अविनाशी, अभिव्यक्त और अनभिव्यक्त दोनों से निर्मित इस विश्व का ईश्वर पालन-पोषण करता है। जब तक जीवात्मा ईश्वर को नहीं जानता, यह सांसारिक भोगों से आसक्त और आबद्ध रहता है। किन्तु जब वह परमात्मा को जान लेता है तब वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
सर्वज्ञ ईश्वर और अल्पज्ञ जीव दोनों अजन्मा हैं। वह शक्ति भी अनन्त आत्मा और अजन्मा है जो भोक्ता और भोग्य दोनों के बीच सम्बन्ध जोड़ती है। जब जीवात्मा यह ब्रह्म का तिर्यक जान जाता है तब वह अनन्त और वैश्व होकर कर्ता के भाव से मुक्त हो जाता है।
प्रकृति नाशवान है और जीवात्मा अविनाशी है। वह, एक मात्र ईश्वर नाशवान और जीवात्मा दोनों पर शासन करता है। उस एकं पर ध्यान करने से और उसके साथ संयुक्त तथा तदात्म हो जाने से अन्त में समस्त अज्ञान या भ्रान्ति से मुक्ति मिल जाती है।
देवाधिदेव भगवान को जान लेने पर सभी बन्धन टूट जाते हैं, सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और जन्म-मृत्यु से मुक्ति मिल जाती है। उन पर ध्यान करने से देह की चेतना से परे जाकर व्यक्ति तीसरी अवस्था में, विश्वैश्वर्यं की अवस्था में पहुँच जाता है। तब उसकी सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और वह एकमेवाद्वितीयं बन जाता है।
जो व्यक्ति भी आत्मा में शाश्वत रूप से विद्यमान है उसे जानना चाहिये। उसे जानकर उससे परे जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता। भोक्ता, भोग्य तथा आनन्द की प्रेरक शक्तिब्रह्म के ये तीन पक्ष हैं।
अग्नि की मूर्ति अपने उद्गम अरणि में स्थित होते हुए भी तब तक दिखाई नहीं देती जब तक इसे रगड़ कर अग्नि को प्रज्जवलित नहीं किया जाता यद्यपि अग्नि का सूक्ष्म रूप अरणि में हमेशा विद्यमान रहता है। अरणि को रगड़ कर पुनः उद्गम से अग्नि को प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार प्रणव पर ध्यान करके आत्मा को अभिव्यक्त रूप में देखा जाता है जो ध्यान से पूर्व भी अव्यक्त रूप में मौजूद थी।
अपनी देह को अरणि बनाकर उसे प्रणव रूपी ऊपरी अरणि के साथ ध्यान की क्रिया रूपी रगड़ के अभ्यास द्वारा गूढ़ अग्नि की भांति भगवान की परम ज्योति को देखना चाहिये।
जैसे तिल में तेल, दधि में मक्खन, भूमिगत स्रोत में जल, काष्ठ में अग्नि है और उसे पीलने, बिलोने, खोदने और रगड़ने से प्राप्त कर सकते हैं, उसी प्रकार आत्मा में परमात्मा छिपा है जिसे सत्य और तप के द्वारा कोई भी प्राप्त कर सकता है।
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