सर्वज्ञ ईश्वर और अल्पज्ञ जीव दोनों अजन्मा हैं। वह शक्ति भी अनन्त आत्मा और अजन्मा है जो भोक्ता और भोग्य दोनों के बीच सम्बन्ध जोड़ती है। जब जीवात्मा यह ब्रह्म का तिर्यक जान जाता है तब वह अनन्त और वैश्व होकर कर्ता के भाव से मुक्त हो जाता है।
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