उस ब्रह्म चक्र में जो सबका जीवन और आश्रय है हंस (यात्री जीवात्मा) भ्रमण कर रहा है। जब वह अपनी वैयष्टिक आत्मा (जीवात्मा) को पृथक् कर अपने स्वयं को प्रेरक शक्ति (परमात्मा) के रूप में अनुभव करने लगता है तब वह उसकी कृपा से अमृतत्व को प्राप्त कर लेता है।
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