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श्वेताश्वतर • अध्याय 1 • श्लोक 8
संयुक्तमेतत्क्षरमक्षरं च व्यक्ताव्यक्तं भरते विश्वमीशः। अनीशश्चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज्ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः॥
नाशवान और अविनाशी, अभिव्यक्त और अनभिव्यक्त दोनों से निर्मित इस विश्व का ईश्वर पालन-पोषण करता है। जब तक जीवात्मा ईश्वर को नहीं जानता, यह सांसारिक भोगों से आसक्त और आबद्ध रहता है। किन्तु जब वह परमात्मा को जान लेता है तब वह समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
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