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श्वेताश्वतर • अध्याय 1 • श्लोक 3
ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्ह्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्‌। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः॥
तब ऋषियों ने एकाग्रचित्त होकर ध्यान योग में स्वयं भगवान की सृजन-शक्ति को देखा जो अपने गुणों में छिपी हुई थी। ये वही एकमेवाद्वितीय हैं जो काल, आत्मा तथा सभी कारणों के अधिपति हैं।
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