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श्वेताश्वतर • अध्याय 1 • श्लोक 14
स्वदेहमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम्‌। ध्याननिर्मथनाभ्यासाद्देवं पश्यन्निगूढवत्‌॥
अपनी देह को अरणि बनाकर उसे प्रणव रूपी ऊपरी अरणि के साथ ध्यान की क्रिया रूपी रगड़ के अभ्यास द्वारा गूढ़ अग्नि की भांति भगवान की परम ज्योति को देखना चाहिये।
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