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अध्याय 32 — द्वात्रिंशत्तम अध्याय
शिवभारतम्
9 श्लोक • केवल अनुवाद
कवीन्द्र बोला – तत्पश्चात् शिवाजी ने पुरातन राजनीति मार्ग को प्रारम्भ करके संपूर्ण प्रभावली प्रांत को अपने पराक्रम से अधीन कर लिया।
शक्ति एवं वेग के युद्ध में निपुण, विख्यात, बुद्धिमान, त्र्यंबकभास्कर को शिवाजी ने तुरंत प्रभावली प्रांत के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया।
क्रोध से राजपुर की संपत्ति को हरण करने वाले एवं शक्ति से शृंगार पुर को जीतने वाले उस शिवाजी को शत्रु पक्ष के सैकड़ों शरणेच्छुक श्रेष्ठ सैनिक प्रणाम करने लगे।
फिर उस नगर की रक्षा के लिए समीप में स्थित विख्यात एवं विशाल किले को क्षणभर देखकर उसने उसका नाम 'प्रतीतगढ़' रख दिया।
चंद्रमा, कमलनाल, चांदनी, द्रवें, चंदन, चंपक-पुष्प आदि से आनंद देकर आनंददायी उस ग्रीष्म ऋतु ने उसकी सेवा की।
आश्रय में स्थित केसर के कांड एवं पारूल के फूल के आधर को धारने करने वाले जिसके बाण है ऐसे कोमल कामदेव ने भी शिवाजी के मन को हरण नहीं किया।
ग्रीष्म ऋतु के आने पर अत्यधिक तप्त सूर्य से किंचित उष्ण हुए पानी के नीचे नदी में शीतल पानी होता है। वहां पशु आश्रय लेते है।
अत्यधिक तीक्ष्ण धूप से युक्त ग्रीष्म ऋतु से प्रत्येक दिन तालाब के पानी के सूख जाने पर सारसपक्षी कीचड़ में बैठने लगे और मछलियां एवं कछुएं मरने लगे।
पुष्पित शिरीष एवं पारूल के गुच्छों की सुगंध से सुगंधित वायु का संयोग विरक्त एवं विद्वान् लोगों के मनों को भी कामज्वर बाधित करने लगा।
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