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अध्याय 1 — शारीरिक उपनिषद्
शारीरिक
17 श्लोक • केवल अनुवाद
पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों का समुच्चय ही यह शरीर है। इस शरीर में जो ठोस पदार्थ हैं, वह पृथ्वी तत्त्व है। जो द्रव पदार्थ हैं, वह जल तत्त्व है। जो ऊष्मा है, वही अग्नि तत्त्व है। जो सतत गतिशील है, वह वायु तत्त्व है और जो सुषिर (पोला-छिद्रयुक्त) है, वह ही आकाश तत्त्व है।
श्रोत्रादि पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। आकाश तत्त्व में श्रोत्र, वायु तत्त्व में त्वचा, अग्रि (तेज) तत्त्व में नेत्र, जल तत्त्व में जिह्वा तथा पृथिवी तत्त्व में घ्राणेन्द्रिय विद्यमान हैं। इन सभी इन्द्रियों के विषय क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध हैं, वे सभी पृथिवी आदि महाभूतों से प्रादुर्भूत हुए हैं।
वाक, हस्त, पाद, गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय) कर्मेन्द्रियाँ कही गयी हैं। इन सभी इन्द्रियों के विषय क्रम से वचन, आदान-प्रदान, गमन, विसर्जन और आनन्द हैं, जो पृथ्वी आदि महाभूतों से ही प्रकट होते हैं।
मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार इन चारों को अन्तःकरण (चतुष्टय) कहा गया है। इनके विषय क्रमशः इस प्रकार हैं - १. संकल्प-विकल्प, २. निश्चय, ३. अवधारणा और ४. अभिमान। मन का क्षेत्र गले का अन्तिम भाग, बुद्धि का स्थान मुख, चित्त का क्षेत्र नाभि और अहंकार का क्षेत्र हृदय बताया गया है।
अस्थि, त्वचा, नाड़ी, रोमकूप तथा मांस - ये सभी पृथ्वी तत्त्व के अंश हैं। मूत्र, कफ, रक्त, शुक्र तथा स्वेद (पसीना) - जल तत्त्व के अंश हैं। क्षुधा, पिपासा, आलस्य, मोह और मैथुन -अग्रि तत्त्व के अंश हैं। फैलाना, दौड़ना, गति करना (चलना), उड़ना, पलकों को संचालित करना आदि वायु तत्त्व के अंश हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय आदि आकाश तत्त्व के अंश हैं।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध ये सभी पृथिवी तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द, स्पर्श, रूप और रस - ये सभी जल तत्त्व के गुण बताए गये हैं। शब्द, स्पर्श और रूप - ये तीनों अग्नि तत्त्व के गुण कहे गये हैं। शब्द तथा स्पर्श वायु तत्त्व के गुण बताये गये हैं और आकाश तत्त्व का मात्र एक ही गुण शब्द कहा गया है।
सात्त्विक, राजस और तामस इन तीन लक्षणों से युक्त ये तीन गुण कहे गये हैं।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना), ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्रोध न करना, गुरु की सेवा करना, शुचिता (पवित्रता), संतोष, सरलता, अमानिता का भाव, दम्भ न करना, आस्तिकता, हिंसा न करना आदि ये सभी गुण विशेषतया सात्त्विक स्वभाव वाले मनुष्यों के कहे गये हैं।
मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता अर्थात् भोग करने वाला हूँ, मैं वक्ता (बोलने वाला) हूँ इस तरह के अभिमान युक्त गुण, राजस स्वभाव वाले मनुष्यों के बताए गए हैं।
निद्रा, आलस्य, मोह, आसक्ति, मैथुन और चौर कृत्य - ये समस्त गुण तामस वृत्ति से युक्त मनुष्यों के कहे गये हैं।
सर्वश्रेष्ठ ऊर्ध्व पद सात्त्विक गुण को कहा गया है, राजस गुण को मध्यम तथा तामस गुण को अधम बताया गया है।
पूर्णसत्य (ब्रह्म) ज्ञान सात्विक है। धर्मज्ञान राजस है और अन्धकार से युक्त अर्थात् तिमिरान्ध (अधर्ममूढ़ता) ही तामस है।
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ये चार अवस्थाएँ हैं। जाग्रत् अवस्था में ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय तथा चार अन्तःकरण मिलकर के चौदह करण (सक्रिय) रहते हैं। स्वप्नअवस्था में चार अन्तःकरण संयुक्त रूप से (सक्रिय) रहते हैं। सुषुप्ति अवस्था में केवल चित्त ही एक करण (सक्रिय) रहता है तथा तुरीयावस्था में केवल जीवात्मा ही रह जाता है।
उन्मीलित (अर्थात् खुले हुए) तथा निमीलित (अर्थात् बन्द नेत्रों) की मध्य स्थिति में जीव और परमात्मा के बीच में जीवात्मा क्षेत्रज्ञ होता है।
ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, पाँच प्राण, मन एवं बुद्धि - इन सत्रह का सूक्ष्म स्वरूप लिङ्ग शरीर कहा गया है, ऐसा जानना चाहिए।
मन, बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथिवी - ये आठ प्रकृति के विकार कहे गये हैं। इनके अतिरिक्त सोलह विकार और बताये गये हैं।
श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा ब्राणेन्द्रिय - ये पाँच विकार तथा गुदा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), हाथ, पैर, तथा वाक् - ये पाँच और शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध - ये पाँच, ये सभी तथा उपर्युक्त मन आदि अष्टविकार मिलकर प्रकृति के (८+५+५+५=२३) तेईस तत्त्व हुए। चौबीसवाँ अव्यक्त प्रधान (प्रकृति) है, पुरुष इससे भी परे (कहा गया) है, (इस प्रकार कुल पच्चीस तत्त्वों के समुच्चय वाला यह विश्वब्रह्माण्ड है) यही (शारीरक) उपनिषद् है।
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