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शारीरिक • अध्याय 1 • श्लोक 5
अस्थिचर्मनाडीरोममांसाश्चेति पृथिव्यंशाः । मूत्रश्लेष्मरक्तशुक्रस्वेदा अबंशाः । क्षुत्तृष्णा- लस्यमोहमैथुनान्यग्नेः । प्रचारणविलेखनस्थूलाक्ष्युन्मेषनिमेषादि वायोः । कामक्रोधलोभमोहभयान्याकाशस्य ॥
अस्थि, त्वचा, नाड़ी, रोमकूप तथा मांस - ये सभी पृथ्वी तत्त्व के अंश हैं। मूत्र, कफ, रक्त, शुक्र तथा स्वेद (पसीना) - जल तत्त्व के अंश हैं। क्षुधा, पिपासा, आलस्य, मोह और मैथुन -अग्रि तत्त्व के अंश हैं। फैलाना, दौड़ना, गति करना (चलना), उड़ना, पलकों को संचालित करना आदि वायु तत्त्व के अंश हैं और काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय आदि आकाश तत्त्व के अंश हैं।
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