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शारीरिक • अध्याय 1 • श्लोक 17
श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा घ्राणं चैव तु पंचमम् । पायूपस्थौ करौ पादौ वाक्चैव दशमी मता ॥ शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धस्तथैव च। त्रयोविंशतिरेतानि तत्त्वानि प्रकृतानि तु ॥ चतुर्विंशतिरव्यक्तं प्रधानं पुरुषः परः इत्युपनिषत् ॥ ॐ सह नाववतु इति शान्तिः ॥ ॥ इति शारीरकोपनिषत्समाप्ता ॥
श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा तथा ब्राणेन्द्रिय - ये पाँच विकार तथा गुदा, उपस्थ (जननेन्द्रिय), हाथ, पैर, तथा वाक् - ये पाँच और शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गन्ध - ये पाँच, ये सभी तथा उपर्युक्त मन आदि अष्टविकार मिलकर प्रकृति के (८+५+५+५=२३) तेईस तत्त्व हुए। चौबीसवाँ अव्यक्त प्रधान (प्रकृति) है, पुरुष इससे भी परे (कहा गया) है, (इस प्रकार कुल पच्चीस तत्त्वों के समुच्चय वाला यह विश्वब्रह्माण्ड है) यही (शारीरक) उपनिषद् है।
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