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अध्याय 1 — प्रत्यभिज्ञाहृदयम

प्रत्यभिज्ञाहृदयम
22 श्लोक • केवल अनुवाद
उस शिव को नमस्कार है जो सतत या बराबर पंचकृत्यों को करता रहता है, जो चिदानन्दधनस्वरूप अपने आत्मा रूपी परमार्थ को (जो कि प्रत्येक का आत्मा है) अवभासित करता है।
शंकर सम्बन्धी जो उपनिषद् या रहस्य है उसका सार प्रत्यभिज्ञा है। उस प्रत्यभिज्ञा रूपी महासमुद्र से संसार रूपी विष को शान्त करने के लिए सार (श्रेष्ठभाग) क्षेमराज ने निकाल कर (इस ग्रंथ में) रख दिया है।
स्वतंत्र चिति ही विश्व की सिद्धि का हेतु है।
अपनी ही इच्छा से, अपनी ही भित्ति (आधार) पर वह (चिति) विश्व को व्यक्त करती है।
विश्व (परस्पर) अनुरूप ग्राह्य (प्रमेय) और ग्राहक (प्रमाता) के भेद से नाना प्रकार का है।
वह चेतन भी (व्यष्टि, चेतन व्यक्ति भी) जिसमे चिति संकुचित हो गई है, संकुचित रूप में विश्वमय ही है।
चिति (परा संविद्‌, समष्टि संविद्‌) ही चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर का चित्त (व्यष्टिगत संविद्‌) बन जाती है क्योकि चेत्य (चेतनाद्वाराग्राह्यपदार्थ) के अनुकल वह संकुचित हो जाती है।
मायाप्रमाता तत्‌ (चित्त) मय होता है। (माया से आवृत्त जो अणु है वह्‌ चित्त-प्रधान है)
और यद्यपि वह (आत्मा) एक है तथापि द्विरूप, त्रिमय चतुर्मय और सात पंचक स्वभाव वाला है।
सब दर्शनों की स्थितियाँ उसकी (आत्मा की) भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ हैं।
जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मल से ढका हुआ संसारी बन जाता है।
इस दशा (संसारी की दशा) में भी उसी (शिव) के समान जीव पाँच कृत्य करता है।
प्रकाशन-आस्वादन, आत्माबोध, बीज का अवस्थापन, विलापन (भेद) से इनको अर्थात् इन पाँच कृत्यों को करता है।
संसारदशा उसके (पंचकृत्य के) अज्ञान के कारण अपनी ही शक्तियों से मोहित हो जाना है।
उसके पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त ही अन्तर्मुखीभाव से चेतनपद पर पहुँच जाने से चिति हो जाता है।
चिति रूपी अग्नि अवरोह पद में (माया से) आच्छादित रहने पर भी प्रमेय (ज्ञेय, पदार्थ) रूपी इन्धन को कुछ अंश में (कुछ सीमा तक) जला देती है।
चिति (चित् शक्ति) के (स्वभावसिद्ध) बल को प्राप्त करने पर वह (साधक) विश्व को आत्मसात् कर लेता है (अपने स्वरूप में समीकरण कर लेता है)।
चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर भी चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है। यही अवस्था जीवन्मुक्ति (जीते हुए भी मुक्ति का बोध) कहलाती है।
मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है।
विकल्प-क्षय, शक्ति का संकोच और विकाम, बाहों का ध्वंस, आदि और अन्त कोटियों (अन्तों) का अभ्यास इत्यादि यहाँ (मध्य के विकास में) उपाय हैं।
समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बार-बार चित् (पारमार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत (सदा प्रकट) समाधि का लाभ होता है।
तब (क्रममुद्रा सिद्धि के अतन्तर) प्रकाश और आनन्द का सार, महामन्त्र वीर्यरूप पूर्ण अहन्ता में समावेश होने से, अपने उस संवित् देवता के समूह पर प्रभुत्व की प्राप्ति होती है जो समूह सारे विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है। यह सब शिव का स्वभाव है।
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