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प्रत्यभिज्ञाहृदयम • अध्याय 1 • श्लोक 7
चितिरेव चेतनपदादवरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम्‌ ।।
चिति (परा संविद्‌, समष्टि संविद्‌) ही चेतन पद (असंकुचित प्रमाता के पद) से उतर का चित्त (व्यष्टिगत संविद्‌) बन जाती है क्योकि चेत्य (चेतनाद्वाराग्राह्यपदार्थ) के अनुकल वह संकुचित हो जाती है।
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