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प्रत्यभिज्ञाहृदयम • अध्याय 1 • श्लोक 16
चितिवह्निरवरोहपदे छन्नोऽपि मात्रया मेयेन्धनं प्लुष्यति ।।
चिति रूपी अग्नि अवरोह पद में (माया से) आच्छादित रहने पर भी प्रमेय (ज्ञेय, पदार्थ) रूपी इन्धन को कुछ अंश में (कुछ सीमा तक) जला देती है।
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