Krishjan
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अध्याय 6 — षष्ठः प्रश्नः
प्रश्न
8 श्लोक • केवल अनुवाद
इसके पश्चात् भारद्वाज सुकेशा ने उनसे पूछा -
हे भगवन्, कोशल का राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया और उसने मुझसे यह प्रश्न पूछा - 'हे भारद्वाज, क्या आप 'पुरुष' एवं 'उसकी' षोडश कलाओं के विषय में जानते हैं?' और मैंने उस कुमार को उत्तर दिया - 'मैं' उसे नहीं जानता; कारण, यदि मैं 'उसे' जानता होता तो निश्चित रूप से तुम्हें 'उसके' विषय में बताता, किन्तु मैं तुमसे असत्य नहीं बोल सकता क्योंकि जो असत्य बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है। 'वह' चुपचाप रथ पर चढ़कर मेरे पास से चला गया। मैं आपसे 'उसके' विषय में पूछ रहा हूँ, कौन है यह 'पुरुष?
ऋषि पिप्पलाद ने उसे उत्तर दिया -
हे सौम्य वत्स! यहीं प्रत्येक प्राणी के अन्तर शरीर में वह 'पुरुष' है, इसी कारण 'उसके' अन्दर ही षोडश कलाओं का जन्म होता है।
उसने 'स्वयं' के विषय में विचार किया। वह कौन हो सकता है जिसके उत्क्रमण करने (निकल जाने) से मैं इस शरीर से निकल (उत्कान्त हो) जाऊँगा तथा जिसके स्थित रहने से मैं स्थित रहूँगा?
तब उसने 'प्राण' को उत्पन्न किया, तथा 'प्राण' से श्रद्धा को, तत्पश्चात् आकाश और फिर वायु, फिर ज्योति फिर जल फिर पृथ्वि, फिर इन्द्रियाँ एवं मन तथा अन्न, फिर अन्न से वीर्य को तथा वीर्य से तप तः तप से मन्त्रों को, इन मन्त्रों से कर्म, कर्म से लोकों को, लोकों में नाम को रचा; 'आत्मा' से इस क्रम में समस्त पदार्थों का जन्म हुआ।
अतः जिस प्रकार प्रवाहित होती हुई नदियाँ सागर की ओर अग्रसर होती हैं, किन्तु सागर में पहुँचकर वे उसी में विलीन हो जाती हैं तथा उनके नाम और रूप समाप्त हो जाते हैं और सब कुछ केवल सागर ही कहलाता है, इसी प्रकार इस द्रष्टारूप 'चैतन्य' की षोडश कलाएँ 'पुरुष' की ओर अग्रसर होती हैं एवं जब वे उस 'पुरुष' को प्राप्त कर लेती हैं तब वे 'उसी' में विलीन हो जाती हैं तथा उनके अपने नाम-रूप समाप्त हो जाते हैं और इस समस्त को एकमात्र 'पुरुष' कहा जाता है; तब 'वह' कला (अंश) रहित एवं अमृत-रूप हो जाता है। जिसके विषय में यह श्लोक है।
जिस प्रकार रथ के चक्र की नाभि में समस्त अरे अवस्थित होते हैं, उसी प्रकार 'वह' है जिसमें ये कलाएँ अवस्थित हैं 'उसी' को 'पुरुष' समझो जो कि ज्ञान का चरम लक्ष्य है, इसी के द्वारा तुम मृत्यु एवं उसकी व्यथा से मुक्त होओगे।
और,
ऋषि पिप्पलाद ने उनसे कहा -
परम ब्रह्म के विषय में मैं इतना ही जानता हूँ। इससे परतर 'उच्चतर' अन्य कुछ भी नही है।
एवं वे उनकी अर्चना करते हुए बोले - आप ही हमारे पिता हैं जिन्होंने हमें 'अविद्या' के उस पार पहुँचा दिया है। परम ऋषिगणों को नमन! (परम ऋषिगणों को) पुनः पुनः नमन!
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