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प्रश्न • अध्याय 6 • श्लोक 1
अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ - - - भगवन्‌ हिरण्यनाभः कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यैतं प्रश्नमपृच्छत - - षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं वेत्थ। तमहं कुमारम्ब्रुवं नाहमिमं वेद यध्यहमिममवेदिषं कथं ते नावक्ष्यमिति। समूलो वा एष परिशुष्यति योऽनृतमभिवदति। तस्मान्नार्हम्यनृतं वक्तुम्‌। स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा पृच्छामि क्वासौ पुरुष इति ॥
इसके पश्चात् भारद्वाज सुकेशा ने उनसे पूछा - हे भगवन्, कोशल का राजकुमार हिरण्यनाभ मेरे पास आया और उसने मुझसे यह प्रश्न पूछा - 'हे भारद्वाज, क्या आप 'पुरुष' एवं 'उसकी' षोडश कलाओं के विषय में जानते हैं?' और मैंने उस कुमार को उत्तर दिया - 'मैं' उसे नहीं जानता; कारण, यदि मैं 'उसे' जानता होता तो निश्चित रूप से तुम्हें 'उसके' विषय में बताता, किन्तु मैं तुमसे असत्य नहीं बोल सकता क्योंकि जो असत्य बोलता है वह समूल नष्ट हो जाता है। 'वह' चुपचाप रथ पर चढ़कर मेरे पास से चला गया। मैं आपसे 'उसके' विषय में पूछ रहा हूँ, कौन है यह 'पुरुष?
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