तस्मै स होवाच।
इहैवान्तःशरीरे सोभ्य स पुरुषो यस्मिन्नताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति ॥
ऋषि पिप्पलाद ने उसे उत्तर दिया - हे सौम्य वत्स! यहीं प्रत्येक प्राणी के अन्तर शरीर में वह 'पुरुष' है, इसी कारण 'उसके' अन्दर ही षोडश कलाओं का जन्म होता है।
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