स प्राणमसृजत। प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनोऽन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राः कर्मलोका लोकेषु च नाम च ॥
तब उसने 'प्राण' को उत्पन्न किया, तथा 'प्राण' से श्रद्धा को, तत्पश्चात् आकाश और फिर वायु, फिर ज्योति फिर जल फिर पृथ्वि, फिर इन्द्रियाँ एवं मन तथा अन्न, फिर अन्न से वीर्य को तथा वीर्य से तप तः तप से मन्त्रों को, इन मन्त्रों से कर्म, कर्म से लोकों को, लोकों में नाम को रचा; 'आत्मा' से इस क्रम में समस्त पदार्थों का जन्म हुआ।
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