स यथेमा नध्यः स्यन्दमानाः समुद्रायणाः समुद्रं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते तासां नामरुपे समुद्र इत्येवं प्रोच्यते।
एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडशकलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति भिध्येते चासां नामरुपे पुरुष इत्येवं प्रोच्यते स एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः ॥
अतः जिस प्रकार प्रवाहित होती हुई नदियाँ सागर की ओर अग्रसर होती हैं, किन्तु सागर में पहुँचकर वे उसी में विलीन हो जाती हैं तथा उनके नाम और रूप समाप्त हो जाते हैं और सब कुछ केवल सागर ही कहलाता है, इसी प्रकार इस द्रष्टारूप 'चैतन्य' की षोडश कलाएँ 'पुरुष' की ओर अग्रसर होती हैं एवं जब वे उस 'पुरुष' को प्राप्त कर लेती हैं तब वे 'उसी' में विलीन हो जाती हैं तथा उनके अपने नाम-रूप समाप्त हो जाते हैं और इस समस्त को एकमात्र 'पुरुष' कहा जाता है; तब 'वह' कला (अंश) रहित एवं अमृत-रूप हो जाता है। जिसके विषय में यह श्लोक है।
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