Krishjan
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अध्याय 5 — पञ्चमः प्रश्नः
प्रश्न
7 श्लोक • केवल अनुवाद
तब
शैब्य सत्यकाम
ने पूछा—
“हे भगवन्!
यदि कोई मनुष्य अपने जीवन के
अंतिम समय
तक
ओंकार
का ध्यान करता है, तो वह
कौन-सा लोक
प्राप्त करता है?”
उसके उत्तर में ऋषि ने कहा— हे
सत्यकाम
, यह
ओंकार
ही वास्तव में
पर
(सगुण/साकार ब्रह्म)
और
अपर
(निर्गुण/निराकार ब्रह्म)
दोनों का रूप है। इसलिए जो
विद्वान्
है, वह इसी
ओंकार-आश्रय
से दोनों में से किसी एक को प्राप्त करता है—अर्थात् उसी के माध्यम से वह
ब्रह्मलोक
या
परम सत्य
की ओर अग्रसर होता है।
यदि कोई साधक
ओंकार
की केवल
एक मात्रा
(अर्थात् ‘अ’ रूप)
का ध्यान करता है, तो वह उसी ज्ञान से प्रेरित होकर शीघ्र ही
मानव लोक
में पुनः प्रतिष्ठित होता है। वहाँ
ऋचाएँ
उसे मानव-जीवन की ओर ले जाती हैं, और वह वहाँ
तप
,
ब्रह्मचर्य
तथा
श्रद्धा
से युक्त होकर
महिमा
का अनुभव करता है।
यदि साधक
ओंकार
की
दो मात्राओं
(‘अ’ और ‘उ’)
के साथ मन को एकाग्र करता है, तो वह
यजुर्वेद
के प्रभाव से
अन्तरिक्ष
की ओर उन्नीत होता है और
सोमलोक
को प्राप्त करता है। वहाँ वह कुछ समय तक
ऐश्वर्य
का अनुभव करता है, किन्तु फिर वहाँ से
पुनः संसार में लौट आता है
।
जो साधक
ओंकार
की
तीन मात्राओं
(अ-उ-म)
सहित उस
परम पुरुष
का ध्यान करता है, वह
सूर्य-तेज
में स्थित होकर
प्रकाशस्वरूप
बन जाता है। जैसे
सर्प के शरीर से उसकी त्वचा अलग हो जाती है
, उसी प्रकार वह
सभी पापों से पूर्णतः मुक्त
हो जाता है। फिर वह
सामवेद
के द्वारा
ब्रह्मलोक
में पहुँचाया जाता है। वहाँ वह इस
जीवघन शरीर
से परे, उस
परात्पर पुरुष
(अत्यन्त सूक्ष्म परम आत्मा)
का साक्षात्कार करता है, जो
पुरि-शयन
(सबके हृदय में निवास करने वाला)
है। यह विषय इस प्रकार के
श्लोकों
में भी कहा गया है।
ओंकार की ये
तीन मात्राएँ
(अ-उ-म)
मृत्युलोक से सम्बद्ध
हैं और परस्पर
एक-दूसरे से जुड़ी हुई
हैं, किन्तु अपनी-अपनी स्थिति में
अविच्छिन्न
रहती हैं। जब इन्हें साधक
बाह्य, आन्तरिक और मध्य
क्रियाओं में
सम्यक् रूप से प्रयुक्त
करता है, तब वह
ज्ञानी
किसी भी प्रकार से
कम्पित या विचलित
नहीं होता—अर्थात् वह
स्थिर ब्रह्म-भाव
में स्थित रहता है।
जो तत्त्व
ऋचाओं
द्वारा इस
स्थूल जगत्
में,
यजुर्वेद
द्वारा
अन्तरिक्ष
में, और
सामवेद
द्वारा उस सूक्ष्म सत्ता में जाना जाता है, जिसे
कवि
(द्रष्टा ऋषि)
जानते हैं— उसको
विद्वान
केवल
ओंकार
को ही आधार बनाकर प्राप्त करता है। वह तत्त्व
शान्त
,
अजर
,
अमर
,
अभय
और
परम
है—अर्थात्
परम ब्रह्म
स्वरूप है।
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