तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ताः अनविप्रयुक्ताः।
क्रियासु बाह्यान्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥
ओंकार की ये तीन मात्राएँ(अ-उ-म)मृत्युलोक से सम्बद्ध हैं और परस्पर एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, किन्तु अपनी-अपनी स्थिति में अविच्छिन्न रहती हैं।
जब इन्हें साधक बाह्य, आन्तरिक और मध्य क्रियाओं में सम्यक् रूप से प्रयुक्त करता है, तब वह ज्ञानी किसी भी प्रकार से कम्पित या विचलित नहीं होता—अर्थात् वह स्थिर ब्रह्म-भाव में स्थित रहता है।
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