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प्रश्न • अध्याय 5 • श्लोक 6
तिस्रो मात्रा मृत्युमत्यः प्रयुक्ता अन्योन्यसक्ताः अनविप्रयुक्ताः। क्रियासु बाह्यान्तरमध्यमासु सम्यक्प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञः ॥
ये मात्राएँ, परस्पर संलग्न एवं अविच्छेद्य, जब तीन मात्राओं के रूप में प्रयोग की जाती हैं तब वे मृत्युमती, मृत्यु की सन्तान-रूप होती हैं; किन्तु ज्ञानी पुरुष इससे विकम्पित नहीं होता; कारण, त्रिविध कर्म होते हैं, बाह्यकर्म, आभ्यन्तर कर्म तथा दोनों के मिश्ररूप कर्म, और वह निर्भय होकर अकम्पित, अविचलित भाव से इन तीनों कर्मों को उचित रूप से करता है।
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