स यध्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याभिसंपध्यते।
तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनुभवति ॥
यदि कोई साधक ओंकार की केवल एक मात्रा(अर्थात् ‘अ’ रूप) का ध्यान करता है, तो वह उसी ज्ञान से प्रेरित होकर शीघ्र ही मानव लोक में पुनः प्रतिष्ठित होता है।
वहाँ ऋचाएँ उसे मानव-जीवन की ओर ले जाती हैं, और वह वहाँ तप, ब्रह्मचर्य तथा श्रद्धा से युक्त होकर महिमा का अनुभव करता है।
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