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प्रश्न • अध्याय 5 • श्लोक 3
स यध्येकमात्रमभिध्यायीत स तेनैव संवेदितस्तूर्णमेव जगत्याभिसंपध्यते। तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते स तत्र तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संपन्नो महिमानमनुभवति ॥
यदि वह इस 'ओंकार' की एक मात्रा का ध्यान करता है तो, उससे अलोकित होकर शीघ्र ही भौतिक जगत् को प्राप्त करता है, तथा ऋग्वेद की ऋचाएँ उसे मनुष्यलोक में ले जाती हैं; वहाँ तप, श्रद्धा एवं ब्रह्मचर्य से सम्पन्न वह महिमा की अनुभूति करता है।
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