यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये संपन्नः।
यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्भुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्भुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात्परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते तदेतौ श्लोकौ भवतः ॥
किन्तु जो इन तीनों मात्राओं वाले 'ओम्' के द्वारा 'परमोच्च पुरुष' का ध्यान करता है, वह प्रकाश एवं ऊर्जा अर्थात् तेजोमय 'सूर्यलोक' को प्राप्त करता है। जिस प्रकार साँप अपनी केंचुली छोड़ देता है, उसी प्रकार यह व्यक्ति पापमुक्त हो जाता है, तथा सामवेद के मन्त्र उसे 'ब्रह्मलोक' में ले जाते हैं। वह उस 'निम्नतर' से, जो जीव की सघनता है, उस 'परात्पर' पुरुष का दर्शन करता है, जिसका प्रत्येक रूप एक धाम है। इसी विषय में ये दोनों श्लोक हैं।
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