तस्मै स होवाच एतद् वै सत्यकाम परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कारः।
तस्माद् विद्वानेतेनैवायतनेनैकतरमन्वेति ॥
उसके उत्तर में ऋषि ने कहा—
हे सत्यकाम, यह ओंकार ही वास्तव में पर(सगुण/साकार ब्रह्म) और अपर(निर्गुण/निराकार ब्रह्म) दोनों का रूप है।
इसलिए जो विद्वान् है, वह इसी ओंकार-आश्रय से दोनों में से किसी एक को प्राप्त करता है—अर्थात् उसी के माध्यम से वह ब्रह्मलोक या परम सत्य की ओर अग्रसर होता है।
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