अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्। स सोमलोके विभुतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥
यदि साधक ओंकार की दो मात्राओं(‘अ’ और ‘उ’) के साथ मन को एकाग्र करता है, तो वह यजुर्वेद के प्रभाव से अन्तरिक्ष की ओर उन्नीत होता है और सोमलोक को प्राप्त करता है।
वहाँ वह कुछ समय तक ऐश्वर्य का अनुभव करता है, किन्तु फिर वहाँ से पुनः संसार में लौट आता है।
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