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प्रश्न • अध्याय 5 • श्लोक 4
अथ यदि द्विमात्रेण मनसि संपद्यते सोऽन्तरिक्षं यजुर्भिरुन्नीयते सोमलोकम्‌। स सोमलोके विभुतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥
और, यदि उसकी (ओंकार की) दो मात्राओं के द्वारा मन में प्राप्त करता है, तो अन्तरिक्ष तक उसका उन्नयन होता है तथा यजुर्वेद के मन्त्र उसे 'चन्द्रलोक' में ले जाते हैं। 'चन्द्रमा' के लोक (सोमलोक) में वह अपनी आत्मा की महिमा का अनुभव करता है; तत्पश्चात् वह पुनः लौट आता है।
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