अध्याय 1 — प्रथम खण्ड
मुद्गल
9 श्लोक • केवल अनुवाद
ॐ मैं उस पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप हूँ, जो श्रीमद् पुरुषसूक्त का तात्पर्य है, जो पूर्ण आनन्दमय स्वरूप वाला है, और जो पुरुषोत्तम नाम से विख्यात है।
ॐ। मेरी वाणी मेरे मन में प्रतिष्ठित हो, और मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे परमात्मन्! मेरे लिए प्रकट होइए, मुझे ज्ञान और मेधा प्रदान कीजिए।
आप मेरे लिए वेदज्ञान के आधार बनें। मैंने जो कुछ सुना और अध्ययन किया है, वह मुझसे कभी दूर न हो। इस अध्ययन के द्वारा मैं दिन और रात को एकाग्र भाव से जोड़ूँगा। मैं ऋत (यथार्थ और धर्मानुकूल सत्य) का वचन बोलूँगा, मैं सत्य का ही वचन बोलूँगा।
वह परमात्मा मेरी रक्षा करे, वह वक्ता की रक्षा करे। वह मेरी रक्षा करे, वह वक्ता की रक्षा करे; वह वक्ता की रक्षा करे।
ॐ।
अब हम पुरुषसूक्त के अर्थ का निर्णय (तात्पर्य-निर्णय) का विवेचन करेंगे। पुरुषसंहिता में पुरुषसूक्त का अर्थ संक्षेप में कहा गया है।
"सहस्रशीर्षा" पद में प्रयुक्त "सहस्र" शब्द का अर्थ केवल एक हजार नहीं, बल्कि अनन्त है। इसी प्रकार "दशाङ्गुल" शब्द भी अनन्त विस्तार का बोध कराता है। अर्थात्, पुरुष का स्वरूप अनन्त, सर्वव्यापक और अपरिमेय है।