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मुद्गल • अध्याय 1 • श्लोक 1
श्रीमत्पुरुषसूक्तार्थं पूर्णानन्दकलेवरम् । पुरुषोत्तमविख्यातं पूर्णं ब्रह्म भवाम्यहम् ॥ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि ॥ वेदस्य म आणीस्थः । श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीते- नाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि ॥ तन्मामवतु तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ पुरुषसूक्तार्थनिर्णयं व्याख्यास्यामः पुरुषसंहितायां पुरुषसूक्तार्थः संग्रहेण प्रोच्यते । सहस्रशीर्षेत्यत्र सशब्दोऽनन्तवाचकः । अनन्तयोजनं प्राह दशाङ्गुलवचस्तथा ॥
ॐ मैं उस पूर्ण ब्रह्म का स्वरूप हूँ, जो श्रीमद् पुरुषसूक्त का तात्पर्य है, जो पूर्ण आनन्दमय स्वरूप वाला है, और जो पुरुषोत्तम नाम से विख्यात है। ॐ। मेरी वाणी मेरे मन में प्रतिष्ठित हो, और मेरा मन मेरी वाणी में प्रतिष्ठित हो। हे परमात्मन्! मेरे लिए प्रकट होइए, मुझे ज्ञान और मेधा प्रदान कीजिए। आप मेरे लिए वेदज्ञान के आधार बनें। मैंने जो कुछ सुना और अध्ययन किया है, वह मुझसे कभी दूर न हो। इस अध्ययन के द्वारा मैं दिन और रात को एकाग्र भाव से जोड़ूँगा। मैं ऋत (यथार्थ और धर्मानुकूल सत्य) का वचन बोलूँगा, मैं सत्य का ही वचन बोलूँगा। वह परमात्मा मेरी रक्षा करे, वह वक्ता की रक्षा करे। वह मेरी रक्षा करे, वह वक्ता की रक्षा करे; वह वक्ता की रक्षा करे। ॐ। अब हम पुरुषसूक्त के अर्थ का निर्णय (तात्पर्य-निर्णय) का विवेचन करेंगे। पुरुषसंहिता में पुरुषसूक्त का अर्थ संक्षेप में कहा गया है। "सहस्रशीर्षा" पद में प्रयुक्त "सहस्र" शब्द का अर्थ केवल एक हजार नहीं, बल्कि अनन्त है। इसी प्रकार "दशाङ्गुल" शब्द भी अनन्त विस्तार का बोध कराता है। अर्थात्, पुरुष का स्वरूप अनन्त, सर्वव्यापक और अपरिमेय है।
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