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मुद्गल • अध्याय 1 • श्लोक 2
तस्य प्रथमया विष्णोर्देशतो व्याप्तिरीरिता । द्वितीयया चास्य विष्णोः कालतो व्याप्तिरुच्यते ॥
प्रथम ऋचा द्वारा भगवान् विष्णु की देशतः व्याप्ति (समस्त स्थानों में सर्वव्यापकता) का वर्णन किया गया है। और द्वितीय ऋचा द्वारा उसी विष्णु की कालतः व्याप्ति (समस्त कालों में सर्वव्यापकता) का प्रतिपादन किया गया है।
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