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मुद्गल • अध्याय 1 • श्लोक 9
यज्ञेनेत्युपसंहारः सृष्टेर्मोक्षस्य चेरितः । य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति ॥
"यज्ञेन" मन्त्र द्वारा सृष्टि और मोक्ष, दोनों का उपसंहार (निष्कर्षात्मक प्रतिपादन) किया गया है। जो पुरुष इस प्रकार पुरुषसूक्त के इस तात्पर्य को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
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