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मुद्गल • अध्याय 1 • श्लोक 5
तस्माद्विराडित्यनया पादनारायणाद्धरेः । प्रकृतेः पुरुषस्यापि समुत्पत्तिः प्रदर्शिता ॥
"तस्माद् विराड्" मन्त्र द्वारा यह प्रतिपादित किया गया है कि भगवान् हरि के पादनारायण स्वरूप से विराट्, प्रकृति तथा पुरुष की उत्पत्ति हुई। अर्थात्, इस मन्त्र में पादनारायण से सम्पूर्ण सृष्टि के प्रादुर्भाव का वर्णन किया गया है।
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