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अध्याय 3 — तृतीय खण्डः

केन
12 श्लोक • केवल अनुवाद
ब्रह्म ने देवताओं के लिए विजय प्राप्त की। उस ब्रह्म की उस विजय से देवता अत्यंत गौरवान्वित (अभिमानी) हो गए। उन्होंने सोचा— ‘यह विजय हमारी ही है, यह महिमा हमारी ही है।
उस (ब्रह्म) ने उनके (देवताओं के) अहंकार को जान लिया। तब वह उनके सामने एक अद्भुत रूप (यक्ष) में प्रकट हुआ। लेकिन वे यह नहीं जान सके कि यह कौन-सा यक्ष है।
उन्होंने अग्नि से कहा — ‘हे जातवेद (अग्नि), तुम यह जानो कि यह यक्ष क्या है।’ अग्नि ने कहा — ‘ठीक है (मैं जानने का प्रयास करता हूँ)।
वह (अग्नि) उसके पास गया। उस (यक्ष) ने उससे पूछा — ‘तुम कौन हो?’ अग्नि ने उत्तर दिया — ‘मैं अग्नि हूँ।’ और आगे कहा — ‘मैं जातवेद (सब कुछ जानने वाला) हूँ।’
उस (यक्ष) ने उससे पूछा— ‘तुममें क्या शक्ति (वीर्य) है?’ अग्नि ने कहा— ‘मैं इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे सब जला सकता हूँ।’
उस (यक्ष) ने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा — ‘इसे जला दो।’ अग्नि पूरी गति से उसकी ओर बढ़ा, पर वह उसे जला न सका। तब वह वहीं से लौट आया और (देवताओं से कहा) — ‘मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है।
तब उन्होंने वायु से कहा— ‘हे वायु, तुम यह जानो कि यह यक्ष क्या है।’ वायु ने कहा— ‘ठीक है (मैं जानने का प्रयास करता हूँ)।’
वह (वायु) उसके पास गया। उस (यक्ष) ने उससे पूछा — ‘तुम कौन हो?’ वायु ने उत्तर दिया — ‘मैं वायु हूँ।’ और आगे कहा — ‘मैं मातरिश्वा (आकाश में गति करने वाला) हूँ।’
उस (यक्ष) ने उससे पूछा— ‘तुममें क्या शक्ति है?’ वायु ने कहा— ‘मैं इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे सब उड़ा सकता हूँ (अपने वश में कर सकता हूँ)।’
उस (यक्ष) ने उसके सामने एक तिनका रख दिया और कहा — ‘इसे उठा लो।’ वायु पूरी गति से उसकी ओर बढ़ा, पर वह उसे उठा न सका। तब वह वहीं से लौट आया और (देवताओं से कहा) — ‘मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष क्या है।’
तब उन्होंने इन्द्र से कहा— ‘हे मघवन् (इन्द्र), तुम यह जानो कि यह यक्ष क्या है।’ इन्द्र ने कहा — ‘ठीक है।’ वह उसके पास गया, लेकिन उसके पहुँचते ही वह (यक्ष) अदृश्य हो गया।
वह (इन्द्र) उसी आकाश में एक अत्यंत शोभायमान स्त्री के पास पहुँचा — वह उमा हैमवती थी। उसने उससे पूछा — ‘यह यक्ष क्या था?’
Krishjan
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