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अध्याय 4 — चतुर्थोऽध्यायः

कौषीतकिब्राह्मण
20 श्लोक • केवल अनुवाद
गर्ग गोत्र में प्रादुर्भूत बलाका ऋषि के पुत्र एवं गार्ग्य के नाम से प्रख्यात एक ब्राह्मण ऋषि थे। उन्होंने चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन किया था, साथ ही वेदों के अच्छे प्रख्यात वक्ता भी थे। उस समय जगत् में उनकी बड़ी ख्याति थी। उनका निवास उशीनर प्रदेश में था, किन्तु सतत गतिशील रहने के कारण, वे कभी मत्स्यदेश, तो कभी कुरु-पाज्वाल में रहा करते थे। इस भाँति वे प्रख्यात गार्ग्य एक काशी के विद्वान् राजा अजातशत्रु के समीप में पहुंचे और अहंकार से युक्त वाणी में बोले - 'हे राजन्! मैं आपके लिए ब्रह्मतत्व का उपदेश करूँगा'। गार्ग्य के इस तरह से कहने पर उन प्रसिद्ध काशी नरेश ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपकी इस बात पर हम आपको एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं। अवश्य ही आज-कल लोग प्रायः जनक-जनक कहते हुए ही उनके पास में दौड़ जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही इस ब्रह्मविद्या के श्रोता एवं दानी हैं, इस प्रकार कहकर प्रायः लोग उन्हीं के समीप में जाते हैं, आज आप हमारे पास आकर विदेहराज जनक की भाँति हमारा गौरव बढ़ाया है, इसलिए हम आपको सहर्ष एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं)।
तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र विप्रवर गार्ग्य जी कहने लगे - 'हे राजन्! यह जो सूर्यमण्डल में अन्तर्यामी परमेश्वर स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मबुद्धि से साधना करता हूँ'। ऐसा सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषि से काशी नरेश अजातशत्रु बोले - 'हे ब्रह्मन् ! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। अवश्य ही यह शुक्लवस्त्रधारी सभी से महान् है। यह सभी का अतिक्रमण करता हुआ सबसे उच्च स्थिति में केन्द्रित है, यह सबका शीश है। इस तरह से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य सूर्य मण्डल में स्थित उस विराट् पुरुष को इस तरह से उपासना करता है, वह सभी का अतिक्रमण कर सबसे उच्च स्थिति में पहुंचता है एवं समस्त भूत-प्राणियों का शीरा माना जाता है।
उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा - 'हे राजन्। चन्द्रमण्डल में जो यह अन्तर्यामी विराट् पुरुष है, मैं इसी को ब्रहारूप में मानकर उपासना करता हूँ'। ऐसा सुन करके उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे अहान्! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। गृह सोम ही राजा है एवं अन्न का आत्मा भी यही है। इस प्रकार से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' इसी तरह यह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत इस पुरुष की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, यह निश्चय ही अन्न की आत्मा हो जाता है अर्थात् अन्न-राशि से युक्त हो जाता है।
तब वे विप्रश्रेष्ठ गार्ग्य मुनि कहने लगे - 'हे राजन्! विद्युत् मण्डल के अन्तर्गत जो यह अन्तर्यामी विराट् परब्रह्म है, मैं उसी का उपासक हूँ'। ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु तुरन्त बोले - 'हे ब्रह्मन्! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इस (विद्युत् को प्रकाश की आत्मा मानकर उसकी उपासना करता हूँ।' इस प्रकार जो भी मनुष्य विद्युत्-मण्डल में स्थित ब्रह्म की उपासना करता है, वह प्रकाश स्वरूप आत्मा ही हो जाता है।
तदुपरान्त बलाका-तनय गार्ग्य ने पुनः कहना प्रारम्भ किया - 'हे राजन्। मेघमण्डल में गर्जना रूप में विद्यमान उस अन्तर्यामी अविनाशी परम ईश्वर की मैं साक्षात् परम ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन प्रख्यात नरेश अजातशत्रु ने उत्तर देते हुए कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इसे शब्द की आत्मा समझकर इस श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करता हूँ।' इस भाँति से जो भी मनुष्य इस मेधमण्डल में विद्यमान परब्रह्म को शब्द की आत्मा मानकर उपासना करता है, वह मनुष्य स्वयं ही शब्द की आत्मा के रूप में परिणत हो जाता है।
तत्पश्चात् पुनः बलाका-नन्दन गार्ग्य ऋषि ने कहा - 'हे राजन्! आकाश मण्डल में प्रतिष्ठित परब्रह्म परमेश्वर की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ'। इस पर राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपको इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहना चाहिए। यह तो पूर्ण, प्रवृत्ति रहित (क्रिया रहित) एवं ब्रह्म अर्थात् सभी से विशाल है। अवश्य ही इसी रूप में मैं इसकी उपासना करता हूँ।' इसी तरह जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध आकाश मण्डल के अन्तर्गत स्थित पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, न तो स्वयं वह और न उसकी संतान ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः कहने लगे - 'हे राजन्! यह जो वायुमण्डल में स्थित विराट् पुरुष है, मैं (गार्ग्य) अविनाशी ब्रह्म के रूप में इसकी उपासना करता हूँ।' गार्ग्य से ऐसा सुनने पर उन प्रसिद्ध नरेश अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपको इस विषय में कुछ भी नहीं कहना चाहिए; यह इन्द्र अर्थात् श्रेष्ठ ऐश्वर्य से युक, वैकुण्ठ अर्थात् कहीं भी कुण्ठाग्रस्त न रहने वाला तथा कहाँ भी न हारने वाली सेना है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ'। इसी तरह से जो भी मनुष्य इस वायुमण्डल के मध्य में स्थित विराट् पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह मनुष्य निश्चित ही सदा विजयी रहने वाला, दूसरों से कभी भी न हारने वाला एवं अपने को पराक्रम के द्वारा वश में करने वाला होता है।
तदनन्तर उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा - 'हे राजन्! यह जो अग्नि मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' इस प्रकार कहे जाने पर वे राजा अजातशत्रु गार्ग्य ऋषि से कहने लगे - 'हे ब्रह्मन्! इस सन्दर्भ में आप कृपा करके कुछ भी संवाद न करें। यह 'विषासहि' अर्थात् दूसरों के प्रहार को सहन करने की सामर्थ्य वाला है। अवश्य ही इसी भावना से मैं इस तत्त्व को उपासना करता हूँ'। इसी तरह से जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध अग्नि के मध्य में स्थित विराट् पुरुष की उपासना करता है, वह इस उपासना के बाद दूसरों का आवेग सहन करने में समर्थ हो जाता है।
उन ख्याति प्राप्त बलाका-पुत्र गार्ग्य जो ने कहा - 'हे राजन्! जो यह जल मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष स्थित है, इसकी ही मैं ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! इस विषय में कृपा करके आप कुछ भी न कहें। यह नामधारी जीवात्मा है, ऐसा जानकर ही मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य इसी भाव से इसकी उपासना करता है, वह नामधारी समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हो जाता है। इसे आधिदैवत उपासना कहा जाता है। आगे अब अध्यात्म उपासना का वर्णन करते हैं।
उन प्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी ने कहा - 'हे राजन्! जो यह दर्पण में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उन गार्ग्य मुनि से राजा अजात्पात्रु ने कहा - 'हे मुने! इसके सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह प्रतिरूप (रूप का ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब) है, अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ। इसी तरह से वह मनुष्य भी यदि इस दर्पण के मध्य में विराट् पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, तो वह उस प्रतिरूप गुण से विभूषित हो जाता है। उसकी संताने उसके अनुरूप ही होती हैं। प्रतिकूल रूप व स्वभाव वाली नहीं होती।
ये प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य फिर बोले - 'हे राजन्! जो यह विराट् पुरुष प्रतिध्वनि में स्थित है, इसको मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' इस प्रकार उन गार्ग्य ऋषि से राजा अजातशत्रु ने कहा - हे ब्राह्मण। आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। यह 'द्वितीय' एवं 'अनपग' (एक ध्वनि के पुनरावृत्ति एवं प्रतिध्यनि में गति का अभाव) है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना के साथ उपासना करता हूँ।' ऐसे ही जो भी उपासक इस प्रतिध्वनिगत विराट् पुरुष की इस ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह अपने अतिरिक्त दूसरे अर्थात् स्त्री-पुत्रादि को प्राप्त कर लेता है और सदा द्वितीयवान् रहता है अर्थात् स्त्री-पुत्रादि से वह वियोग को नहीं प्राप्त होता।
वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः बोले - 'हे राजन्! जो यह गमन करते हुए विराट् पुरुष के पीछे ध्वन्यात्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसी अविनाशी परमात्मा की मैं ब्रह्म रूप से उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर प्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! इस संदर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह प्राण स्वरूप है, इसलिए निश्चित रूप से इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो भी उपासक इस श्रेष्ठ तत्त्व की इस रूप में उपासना करता है, वह पूर्ण आयु के पहले मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है और न ही उसकी सन्तान ही पूर्ण आयु के पूर्व मृत्यु को प्राप्त होती है।
सुप्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी पुनः कहने लगे - 'हे राजन्! शरीरधारी के साथ जो छाया विचरण करती है, मैं उसी छायारूप विराट् पुरुष की उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन गार्ग्य ऋषि से सुप्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह छाया तो मृत्युरूप है, मैं इसकी उसी भाव से उपासना करता हूँ।' जो उपासक उस विराट् ब्रह्म की इस रूप में उपासना करता है, वह समय से पहले मृत्यु को नहीं प्रात होता है और न ही उसके पुत्र ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
गार्ग्य जी ने आगे कहा - 'हे राजन्! यह जो विराट् पुरुष शरीर में स्थित है, उसे मैं साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह प्रजापति स्वरूप है, इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो भी मनुष्य इस शरीर में निवास करने वाले पुरुष की प्रजापति भाव से उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है।
गार्ग्य जी पुनः बोले - 'हे राजन्! यह जो प्रज्ञा से नित्य-युक्त प्राण स्वरूप आत्मा है, जिससे एकता को प्राप्त करके यह सोया हुआ विराट् पुरुष स्वप्न मार्ग से विचरण करता है (अर्थात् विभिन्न तरह के स्वप्नों का अनुभव करता है), उसी की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' यह सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा - 'है ब्रह्मन्! इस सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह यम राजा है, ऐसा जानकर मैं इसी भाव से इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य इसकी इसी तरह से उपासना करता है, उस उपासक की श्रेष्ठता-अभिवर्धन हेतु यह समस्त संसार नियमपूर्वक चेष्टा करता है।
पुनः गार्ग्य जो ने कहा - 'हे राजन्! जो यह दाहिने नेत्र में विराट् पुरुष स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मरूप में उपासना करता हूँ।' ऐसा गार्ग्य ऋषि से सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! कृपया आप इस विषय में कुछ भी न कहें।' यह नाम, अग्रि एवं ज्योति की आत्मा है। इसकी मैं इसी भावना के अनुसार उपासना करता हूँ।' इसी तरह से जो भी उपासक इसकी उपासना करता है, वह इन सभी की आत्मा के समान हो जाता है।
तब गार्ग्य पुनः बोले - 'हे राजन्! यह जो बायें नेत्र में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी श्रेष्ठ पुरुष को मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह सत्य का, विद्युत् का एवं तेज का आत्मा है। इसकी मैं इसी भाव से उपासना करता हूँ।' जो भी उपासक इसकी इस भाव से उपासना करता है, वह सभी की आत्मा हो जाता है।
राजा अजातशत्रु के इस तरह से कहने के पश्चात् वे बलाका-तनय गार्ग्य जी मौन हो गये। तदनन्तर उन (गार्ग्य जी) से राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे बलाके! क्या इतना ही आपका ब्रह्मज्ञान है?' इस प्रश्न पर बलाका-पुत्र गार्ग्य ने कहा - 'हाँ, इतना ही है। तब राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! तब तो व्यर्थ ही आपने यह कहा कि तुम्हारे लिए ब्रह्म का उपदेश करूँगा।' निश्चय ही जो आपके द्वारा कहे हुए इन सभी सोपाधिक पुरुषों का कर्ता है - वही जानने योग्य है। उन श्रेष्ठ राजा अजातशत्रु के इस तरह कहने पर वे प्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य हाथ में समिधा ग्रहण कर उनके पास जाकर कहने लगे - 'हे राजन्! मैं आपको गुरु बनाने के लिए आपके पास आया हूँ।' ऐसा सुनकर राजा ने कहा - 'यह विपरीत बात हो जायेगी, यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को शिष्य बनाने के लिए अपने पास बुलाये। अतः आप आयें (एकान्त स्थान की ओर चलें), वहाँ आपको निश्चय ही मैं स्वयं विराट् ब्रह्म का बोध कराऊँगा।' ऐसा कहकर राजा (अजातशत्रु) बलाका-तनय गार्ग्य का हाथ पकड़ करके वहाँ से चल दिये। वे दोनों (राजा एवं गार्ग्य) एक सोये हुए व्यक्ति के पास आये। वहाँ पर राजा अजातशत्रु ने उस सोये हुए व्यक्ति को जगाने का प्रयास करते हुए बुलाया - 'हे ब्रह्मन्! हे पाण्डरवास! हे सोम राजन्! इस तरह से सम्बोधन करने पर भी जब वह व्यक्ति सोया ही रहा, तब उस व्यक्ति के शरीर में छड़ी से प्रहार किया। जैसे ही उसके शरीर में प्रहार किया गया, वह सोया हुआ व्यक्ति उस छड़ी की चोट से उठकर खड़ा हो गया। ऐसा दृश्य देखकर बलाका-पुत्र गार्ग्य से राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे बलाके! यह व्यक्ति इस तरह अचेत सा रहकर कहाँ शयन करता था? किस प्रदेश में इसका शयन हुआ था? तथा इस जाग्रत्-अवस्था में यह कहाँ से आ गया है?
गार्ग्य इस रहस्य को न समझ पाये, तब पुनः उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे बलाका-तनय! यह पुरुष इस तरह से अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ शयन करता था और इस जाग्रत्-अवस्था में इसका जहाँ से आगमन हुआ है, वह स्थान इस प्रकार से जाना जाता है। 'हिता' नाम से प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ हैं, जो कि हृदय-कमल से सम्बन्ध रखने वाली हैं। ये (नाड़ियाँ) हृदय कमल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में विस्तृत होकर फैली हुई हैं। इन नाड़ियों का परिमाण इस तरह से है - एक बाल के हजारवें भाग के बराबर ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म वे सभी नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् विभिन्न तरह के रंगों का जो अति सूक्ष्मतम रस है, इससे वे पूर्ण हैं। शुक्ल, कृष्ण, पोत एवं रक्त आदि इन सभी रंगों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंशों से वे सम्पन्न हैं। उन्हीं समस्त नाड़ियों में यह पुरुष सुषुप्तावस्था के समय विद्यमान रहता है। जिस समय यह सोया हुआ पुरुष किसी भी तरह का स्वप्र नहीं देखता, तब उस समय यह इस मुख्य प्राण तत्त्व में ही एकात्मभाव को प्राप्त कर लेता है। उस समय वाणी अपने समस्त नामों सहित इस प्राणतत्त्व में विलीन हो जाती है। चक्षु भी अपने सभी रूपों के साथ इस प्राण में ही मिल जाता है। कर्णेन्द्रिय अपने सभी शब्दों के साथ इस प्राण में विलीन हो जाती है और मन भी सभी चिन्तनयुक्त विषयों के सहित इस प्राण-तत्त्व में विलीन हो जाता है। यह पुरुष जन जाग जाता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्रि से सभी दिशाओं की तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राणतत्त्व बहिर्गमन कर अपने-अपने भोग्य-स्थल की तरफ गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि देवों का प्रादुर्भाव होता है एवं साथ ही देवताओं से लोक अर्थात् नाम आदि विषयों का प्राकट्य होता है। उस श्रेष्ठ आत्मा की प्राप्ति का उदाहरण इस तरह से है - जैसे धुरधान (अर्थात् छुरा रखने हेतु निर्मित की हुयी चर्मयुक्त पेटी) में छुरा रखा रहता है, वैसे ही शरीर के अन्दर हृदय-कमल में अङ्गुष्ठ-मात्र पुरुष के रूप में परमात्म सत्ता की स्थिति होती है एवं जिस तरह अग्नि अपने नीड-भूत-अरणी आदि काष्ठ में सभी जगह फैली रहती है, उसी प्रकार यह प्रज्ञावान् आत्मा इस 'आत्मा' नाम से सम्बोधित किये जाने वाले शरीर में नख से शिखा तक व्याप्त है।
उसी साक्षीरूप आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा (इन्द्रियाँ) अनुगत सेवक की भाँति ठीक वैसे ही अनुसरण करती हैं, जैसे श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न धनी का, उसके आश्रय में जीवन व्यतीत करने वाले स्वजन अनुवर्तन करते हैं। जिस तरह धनी अपने आत्मीय जनों के साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनी का ही उपभोग करते हैं, उसी प्रकार यह प्रज्ञा सम्पन्न आत्मा इन वाणी आदि आत्माओं के सहित उपभोग करता है और अवश्य ही इस आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा उपभोग करते हैं। वे प्रख्यात देवराज इन्द्र जब तक इस आत्मा को नहीं जान पाये थे, तब तक उन्हें समस्त दैत्य समूह पराजित करते रहते थे; किन्तु जैसे ही उन्होंने अपनी आत्मा को जाना, वैसे ही देवराज इन्द्र ने उन समस्त दैत्यों को विनष्ट कर, उन्हें परास्त करके सम्पूर्ण देवों में श्रेष्ठता का पद, स्वर्ग का राज्य एवं त्रिलोको का अधिकार प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार आत्मा को जानने वाला ज्ञानी अपने समस्त पापों को मिटाकर सभी भूत-प्राणियों में श्रेष्ठ होकर स्वाराज्य और प्रभुता को प्राप्त कर सभी का स्वामी बन जाता है। जो भी उपासक इस प्रकार से उसे जानता है, उसे ऊपर कहे हुए सम्पूर्ण फलों की प्राप्ति हो जाती है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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