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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 4 • श्लोक 3
स होवाच बालाकिर्य एवैष चन्द्रमसि पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सोमो राजाऽन्नस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो मेवमुपास्तेऽन्नस्यात्मा भवति ॥
उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा - 'हे राजन्। चन्द्रमण्डल में जो यह अन्तर्यामी विराट् पुरुष है, मैं इसी को ब्रहारूप में मानकर उपासना करता हूँ'। ऐसा सुन करके उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे अहान्! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। गृह सोम ही राजा है एवं अन्न का आत्मा भी यही है। इस प्रकार से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' इसी तरह यह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत इस पुरुष की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, यह निश्चय ही अन्न की आत्मा हो जाता है अर्थात् अन्न-राशि से युक्त हो जाता है।
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