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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 4 • श्लोक 2
स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः । बृहन्पाण्डरवासा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति ॥
तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र विप्रवर गार्ग्य जी कहने लगे - 'हे राजन्! यह जो सूर्यमण्डल में अन्तर्यामी परमेश्वर स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मबुद्धि से साधना करता हूँ'। ऐसा सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषि से काशी नरेश अजातशत्रु बोले - 'हे ब्रह्मन् ! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। अवश्य ही यह शुक्लवस्त्रधारी सभी से महान् है। यह सभी का अतिक्रमण करता हुआ सबसे उच्च स्थिति में केन्द्रित है, यह सबका शीश है। इस तरह से मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य सूर्य मण्डल में स्थित उस विराट् पुरुष को इस तरह से उपासना करता है, वह सभी का अतिक्रमण कर सबसे उच्च स्थिति में पहुंचता है एवं समस्त भूत-प्राणियों का शीरा माना जाता है।
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