स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयित्त्रौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः शब्दस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते शब्दस्यात्मा भवति ॥
तदुपरान्त बलाका-तनय गार्ग्य ने पुनः कहना प्रारम्भ किया - 'हे राजन्। मेघमण्डल में गर्जना रूप में विद्यमान उस अन्तर्यामी अविनाशी परम ईश्वर की मैं साक्षात् परम ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन प्रख्यात नरेश अजातशत्रु ने उत्तर देते हुए कहा - 'हे ब्रह्मन्! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इसे शब्द की आत्मा समझकर इस श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करता हूँ।' इस भाँति से जो भी मनुष्य इस मेधमण्डल में विद्यमान परब्रह्म को शब्द की आत्मा मानकर उपासना करता है, वह मनुष्य स्वयं ही शब्द की आत्मा के रूप में परिणत हो जाता है।
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