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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 4 • श्लोक 11
स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रति श्रुत्कायां पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुमां मैतस्मिन्संवाद‌यिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विन्दते द्वितीयाद्वितीयवान्भवति ॥
ये प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य फिर बोले - 'हे राजन्! जो यह विराट् पुरुष प्रतिध्वनि में स्थित है, इसको मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।' इस प्रकार उन गार्ग्य ऋषि से राजा अजातशत्रु ने कहा - हे ब्राह्मण। आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। यह 'द्वितीय' एवं 'अनपग' (एक ध्वनि के पुनरावृत्ति एवं प्रतिध्यनि में गति का अभाव) है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना के साथ उपासना करता हूँ।' ऐसे ही जो भी उपासक इस प्रतिध्वनिगत विराट् पुरुष की इस ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह अपने अतिरिक्त दूसरे अर्थात् स्त्री-पुत्रादि को प्राप्त कर लेता है और सदा द्वितीयवान् रहता है अर्थात् स्त्री-पुत्रादि से वह वियोग को नहीं प्राप्त होता।
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