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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 4 • श्लोक 1
अथ गाग्यों ह वै बालाकिरनूचानः संस्पृष्ट आस सोऽवददुशीनरेषु स वसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशिविदेहेष्विति स हाजातशत्रु काश्यमेत्योवाच । ब्रह्म तें ब्रवाणीति तं होवाचा- जातशत्रुः । सहस्त्रं दद्यस्त इत्येतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना धावन्तीति ॥
गर्ग गोत्र में प्रादुर्भूत बलाका ऋषि के पुत्र एवं गार्ग्य के नाम से प्रख्यात एक ब्राह्मण ऋषि थे। उन्होंने चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन किया था, साथ ही वेदों के अच्छे प्रख्यात वक्ता भी थे। उस समय जगत् में उनकी बड़ी ख्याति थी। उनका निवास उशीनर प्रदेश में था, किन्तु सतत गतिशील रहने के कारण, वे कभी मत्स्यदेश, तो कभी कुरु-पाज्वाल में रहा करते थे। इस भाँति वे प्रख्यात गार्ग्य एक काशी के विद्वान् राजा अजातशत्रु के समीप में पहुंचे और अहंकार से युक्त वाणी में बोले - 'हे राजन्! मैं आपके लिए ब्रह्मतत्व का उपदेश करूँगा'। गार्ग्य के इस तरह से कहने पर उन प्रसिद्ध काशी नरेश ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपकी इस बात पर हम आपको एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं। अवश्य ही आज-कल लोग प्रायः जनक-जनक कहते हुए ही उनके पास में दौड़ जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही इस ब्रह्मविद्या के श्रोता एवं दानी हैं, इस प्रकार कहकर प्रायः लोग उन्हीं के समीप में जाते हैं, आज आप हमारे पास आकर विदेहराज जनक की भाँति हमारा गौरव बढ़ाया है, इसलिए हम आपको सहर्ष एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं)।
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