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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 4 • श्लोक 6
स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्निन्संवादयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्येति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिः । नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते ॥
तत्पश्चात् पुनः बलाका-नन्दन गार्ग्य ऋषि ने कहा - 'हे राजन्! आकाश मण्डल में प्रतिष्ठित परब्रह्म परमेश्वर की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ'। इस पर राजा अजातशत्रु ने कहा - 'हे ब्रह्मन्! आपको इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहना चाहिए। यह तो पूर्ण, प्रवृत्ति रहित (क्रिया रहित) एवं ब्रह्म अर्थात् सभी से विशाल है। अवश्य ही इसी रूप में मैं इसकी उपासना करता हूँ।' इसी तरह जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध आकाश मण्डल के अन्तर्गत स्थित पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, न तो स्वयं वह और न उसकी संतान ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं।
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