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अध्याय 2 — द्वितीयोऽध्यायः
कौषीतकिब्राह्मण
15 श्लोक • केवल अनुवाद
(प्राण तत्त्व की उपासना) सुप्रसिद्ध 'कुषीतक' ऋषि के सुपुत्र ऋषि कौषीतकि कहते हैं कि यह प्राण ही ब्रह्म है। उन प्रसिद्ध प्राण रूप ब्रह्म को यहाँ पर राजा के स्वरूप में कल्पित किया गया है। उन (प्राण) का मन ही दूत है, वाणी परोसने वाली उनकी रानी है, चक्षु संरक्षक (मन्त्री) है और कर्णेन्द्रिय संदेश सुनाने वाला द्वारपाल है। उन सुप्रसिद्ध प्राणरूप ब्रह्म को बिना माँगे ही ये सभी इन्द्रियाभिमानी देवगण भेंट प्रदान करते हैं। (प्राण के संसर्ग से मन एवं इन्द्रियों को क्रियाएँ सहज ही होने लगती हैं, यह प्रक्रिया स्वचालित होने से इसे बिना माँगे दी जाने वाली भेंट कहा गया है।) इस तरह से जो इस रहस्य का ज्ञाता है, उसको बिना याचना किये ही समस्त चराचर प्राणी भेंट समर्पित करते हैं। उस श्रेष्ठ प्राण के उपासक के लिए यह गूढ़ व्रत है कि 'वह किसी से कभी कुछ भी न माँगे'। ठीक वैसे ही, जैसे कोई भिक्षुक गाँव में भीख मांगने पर जब कुछ भी नहीं पाता, तो निराश होकर बैठा रहता है एवं कुपित होकर यह प्रतिज्ञा कर लेता है कि अब से इस गाँव के लोगों के द्वारा देने पर भी दान ग्रहण नहीं करूँगा। वह भिक्षु जिस दृढ़ता से अपनी बात पर आरूढ़ रहता है, वैसे ही प्राण की उपासना करने वाले को अपने न माँगने के व्रत पर दृढ़ रहना चाहिए। याचक धर्म के साथ दीनता का भाव जुड़ा रहता है। याचना एवं दैन्य प्रदर्शन से सदा दूर रहने वाले साधक को लोग ऐसे ही आमन्त्रण देते रहते हैं - 'आओ' हम तुम्हें भिक्षा प्रदान करेंगे।
'प्राण ही ब्रह्म है' ऐसा प्रसिद्ध महात्मा पैङ्गय भी कहते हैं। उन प्रसिद्ध प्राण रूप ब्रह्म के लिए वाणो से परे नेत्र-इन्द्रिय है, जो वाक् इन्द्रिय को सभी ओर से व्याप्त करके विद्यमान है। चक्षु से परे श्रोत्रेन्द्रिय है, उसने नेत्र को सब ओर से व्याप्त कर रखा है। श्रवणेन्द्रिय से परे मन है, जो कि श्रवणेन्द्रिय को सब ओर से व्याप्त करके स्थित है; क्योंकि मन के सावधान रहने पर ही यह श्रोत्रेन्द्रिय श्रवण करने में समर्थ हो सकती है। मन से परे प्राण है, जो मन को सभी ओर से ब्यात करके स्थित है। प्राण ही मन को बाँधकर रखने वाला है, ऐसी बात प्रसिद्ध है। प्राण के न रहने पर तो मन भी नहीं रह सकता, इसलिए सब की अपेक्षा श्रेष्ठ एवं आन्तरिक आत्मा होने से प्राण का ब्रह्म होना उचित ही है। उस प्राण स्वरूप परमात्मा को ये सभी देवगण उसके न माँगने पर भी उपहार समर्पित करते हैं। इसी तरह से जो उसे ऐसा जानता है, उस साधक को समस्त जीव बिना याचना के ही पृथक् पृथक् उपहार प्रदान करते हैं। उसका यह अत्यन्त दृढ़ निश्चय है कि वह किसी से कभी भी याचना न करे। इस सन्दर्भ में वही पूर्वोक्त उदाहरण है।
अब एकमात्र धन (प्राण) के निरोध की बात कही जाती है। यदि एक मात्र धन (प्राण) का ध्यान करे, तो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को या फिर शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष की किसी भी शुभ-तिथि को पुण्य (श्रेष्ठ नक्षत्र में अग्रि की स्थापना, (वेदी का) परिसमूहन संस्कार, कुशों का बिछाना, अभिमन्त्रित जल से अग्निवेदो आदि का अभिषेक एवं अग्रि पर पात्र में रखे हुए घृत का शोधन करके दाहिने घुटने को पृथ्वी पर स्थिर करके स्रुवा से, चमस से या काँसे की करछुल से (मूल संस्कृत में दिये गये वाङ्नाम देवता..... स्वाहा आदि मन्त्रों द्वारा) विधिवत् आहुति समर्पित करे। मन्त्रों के भाव इस प्रकार हैं - ॐ वाङ्नाम देवतावरोधिनी.. अवरुन्धां तस्यै स्वाहा - 'वाणी' नाम से प्रसिद्ध देवी अवरोधिनी साधक की कामना पूर्ति करने वाली है। वह मुझ प्राण की उपासना करने वाले को अमुक व्यक्ति से इच्छित अर्थ की सिद्धि कराये; उसके लिए यह घृताहुति सादर समर्पित है। प्राण देवता अभीष्ट सिद्धि प्रदान करने में समर्थ हैं, वे मुझ प्राणोपासक को धन (प्राण) की प्राप्ति कराएँ। इसके लिए यह आहुति समर्पित है। चक्षु नाम से युक्त देवी कामनापूर्ति में सहायक है, वह देवी मुझ प्राणोपासक को अमुक व्यक्ति से अभीष्ट धन (प्राण) प्राप्त कराए। यह घृताहुति उसी के लिए समर्पित है। श्रोत्र नाम से युक्त देवी अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है, वह मुझ प्राणस्वरूप ब्रह्म के साधक को अमुक व्यक्ति से इच्छित धन (प्राणों) की प्राप्ति कराये, इसके निमित्त यह घृताहुति समर्पित है। 'मन' नाम वाली देवी अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है, वह मुझ प्राण की उपासना करने वाले को अमुक व्यक्ति से इच्छित धन (प्राण) की प्राप्ति कराये, यह घृताहुति उसके निमित्त समर्पित है। 'प्रज्ञा' नामक देवी इच्छित फल देने वाली है। वह मुझ प्राणदेव के उपासक को अमुक व्यक्ति से अभीष्ट धन (प्राण) की प्राप्ति कराये। यह आहुति उसके लिए ही समर्पित है। इस तरह से आहुतियाँ देने के बाद होम-धूम की गन्ध को ग्रहण करके हवन से बचे हुए घृत से अपने अंगों में लेपन करके मौन भाव से धन-स्वामी के समीप में गमन करे और इच्छित अर्थ के सम्बन्ध में कहे कि इतने धन की मुझे विशेष आवश्यकता है। अतः आपके यहाँ प्राप्त हो जाना चाहिए अथवा यदि धनिक कहीं दूर है, तो किसी दूत के द्वारा उक्त संदेश कहलाने के लिए उसके पास भेज देना चाहिए। इस प्रकार के कार्य द्वारा अभीष्ट धन (प्राण) की प्राप्ति हो जाती है।
अब इसके पश्चात् वाणी आदि देवों के द्वारा सिद्ध होने वाले अभीष्ट की पूर्ति का प्रकार बताया गया है। यदि उपासक किसी का आत्मीय बनने की इच्छा करे, तो उसे किसी का भी प्रिय होने से पूर्व 'वाक्' आदि देवों का आत्मीय-प्रिय बनना चाहिए। किसी एक शुभ पर्व के दिन पूर्वोक्त नियमानुसार शुभ तिथि एवं शुभ मुहूर्त में पहले कहे हुए के अनुसार ही अग्नि की स्थापना, (बेदी का) परिसमूहन (संस्कार करना), कुशों का बिछाना, वेदी आदि का अभिषेक, घृत का उत्पवन (शोधन) आदि करके 'वाचं ते मयि........ स्वाहा' आदि मंत्रों से घृताहुतियाँ समर्पित करे। मंत्रों के अर्थ इस प्रकार हैं - मैं तुम्हारी वागिन्द्रिय का अपने में हवन करता हूँ, मेरा अभीष्ट कार्य सिद्ध हो जाये, इस भाव से यह आहुति समर्पित है। मैं अपने अभीष्ट की पूर्ति के लिए आपके प्राण, चक्षु, श्रोत्र एवं मन आदि इन्द्रियों तथा आपकी प्रज्ञा को भी अपने में हवन करता हूँ। इस भाव से ये विशेष घृताहुतियाँ आपके लिए समर्पित हैं। इन आहुतियों के पश्चात् होम-धूम की गन्ध को घ्राणेन्द्रिय के द्वारा ग्रहण कर होमावशिष्ट घृत का अपने अंगों पर लेपन करके मौन रहते हुए अमुक व्यक्ति के पास जाए अथवा ऐसे स्थान पर खड़ा होकर कहे कि जहाँ वायु के सहयोग से उसके शब्द इच्छित व्यक्ति के कानों में सुनाई पढ़ें, तो निश्चय ही वह उस (व्यक्ति) का प्रिय हो जाता है। इतना ही नहीं बल्कि उस जगह से हट जाने पर वहाँ के निवासी उसको सदैव स्मरण करते रहते हैं।
आध्यात्मिक अग्रिहोत्र- अब दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के द्वारा किया गया अनुष्ठान, 'प्रातर्दन' नाम से प्रख्यात और संयम से पूर्ण होने से 'सांयमन' कहलाने वाले अग्निहोत्र के सम्बन्ध में बतलाते हैं। निश्चय ही व्यक्ति मुख से जब तक कुछ बोलता रहता है, तब तक वह पूर्ण रूप से श्वास नहीं ग्रहण कर पाता। उस समय वह प्राण का वाणीरूप अग्नि में हवन कर देता है। ये वाणी एवं प्राणरूप दो आहुतियाँ कभी अन्त न होने वाली तथा अमृत स्वरूप है। जाग्रत् एवं स्वप्नकाल में भी प्राणी सदैव अविच्छिन्न रूप से इन आहुतियों को होमता रहता है। इसके अतिरिक्त वाणी एवं प्राणरूप आहुतियों से भिन्न जो अन्य दूसरी द्रव्यमयी आहुतियाँ हैं, वे कर्म द्वारा ही गतिमान् रहती है। यह प्रसिद्ध है कि इस रहस्य को जानने वाले प्राचीनकालीन विद्वान् केवल कर्ममय अग्निहोत्र का अनुष्ठान सम्पत्र नहीं करते थे। (यहाँ ऋषि यह स्पष्ट कर रहे हैं कि पदार्थ परक अग्निहोत्र के साथ भाव-संयोग पूर्वक बाणी और प्राण की अमूर्त आहुतियाँ भी समर्पित की जानी चाहिए, तभी उनका आध्यात्मिक प्रभाव उभरता है। इसके लिए साधकों को वाक् और प्राण की साधना विशेष रूप से करनी पड़ती है।)
सुप्रसिद्ध महात्मा शुष्कभृङ्गार भी 'उक्थ' अर्थात् प्राण ही ब्रह्म है - ऐसा कहते हैं। उक्थरूपी प्राण को ऋक् मानकर बुद्धिपूर्वक उपासना करे। जो उक्थ में ऋक् को जान लेता है, उस ज्ञानी की समस्त प्राणी श्रेष्ठ बनने के लिए प्रार्थना करते हैं। वह उक्थ रूप प्राण 'यजुर्वेद' है, इसकी श्रेष्ठ बुद्धि से उपासना करे। इससे समस्त प्राणी श्रेष्ठता के लिए उस ज्ञानी के साथ सहयोग करते हैं। जिस साधक की उक्थ में साम बुद्धि हो, उसके सामने समस्त श्रेष्ठ-काम्य प्राणी सिर झुकाते हैं। वह उक्थ रूप प्राण 'श्री' है। उसकी श्री भाव से उपासना की जाती है। वह उक्थ 'यश' है, इस भाव से उपासना करनी चाहिए। वह 'तेजरूप' है, इस भावना से उपासना करे। इस सन्दर्भ में यह उदाहरण है - जिस प्रकार अध्यात्म शास्त्र सभी शास्त्रों में अत्यन्त श्री-सम्पन्न, परम यशस्वी एवं परम तेजोमय होता है, वैसे ही जो इस तरह से उस उक्थरूप प्राण को जानता है, वह मनीषी सम्पूर्ण प्राणियों में सर्वाधिक श्री-सम्पन्न, परम यशस्वी तथा परम तेजोमय होता है। इस उक्यरूप प्राण को एवं ईंटों के द्वारा निर्मित वेदी पर संचित कर्ममय अग्रि को भी अभिन्न अनुभव करते हुए अध्वर्यु नामक ऋत्विक् अपना संस्कार सम्पन्न करता है। उस प्राण में ही वह यजुर्वेद साध्य कार्यों का विस्तार करता है। इस वेदरूपी त्रयी विद्या की आत्मा - यह अध्वर्यु रूप प्राण है। प्राण को ही इस विद्या की आत्मा कहा गया है। जो प्राणी इस प्राण को इस प्रकार से जानता है, वह स्वयं भी प्राण के सदृश हो जाता है ॥
(विविध उपासनाओं का वर्णन) इसके पश्चात् अब कौषीतकि ऋषि के द्वारा अनुभव में लायी हुई तीन बार सम्पन्न की जाने वाली उपासना पद्धति कही जाती है। यज्ञोपवीत को सव्य भाव से बायें कन्धे पर रखकर आचमन करे तदनन्तर जल पात्र को तीन बार शुद्ध जल से भरकर उदय होते हुए सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्य प्रदान करते समय इस मन्त्र का उच्चारण करे) 'ॐ वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृधि' अर्थात् 'संसार को तृणवत् त्याग देने से तुम वर्ग कहलाते हो, मेरे पापों को मुझसे दूर करो। इसी तरह मध्याह्नकाल में भी भगवान् भास्कर का उपस्थान करे। (उस समय इस मंत्र का उच्चारण करे) 'ॐ उद्वगोंऽसि पाप्मानं मे संवृद्धि' अर्थात् तुम उद्वर्ग कहे जाते हो, मेरे पापों को नष्ट करो। इसी तरह से सायंकाल में अस्त होते हुए भगवान् सूर्य का निम्न मंत्र से उपस्थान करे - 'ॐ संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृधि' अर्थात् तुम सवर्ग कहलाते हो, अत: मेरे पापों को दूर करो। इस उपासना का परिणाम यह है कि मनुष्य दिन एवं रात्रि में होने वाले समस्त पापों का पूर्णतः परित्याग करने में समर्थ हो जाता है।
(अब दूसरी उपासना का वर्णन करते हैं) हर महीने की अमावस्या को, जब सूर्य के पश्चिम भाग में स्थित सुषुम्ना नामक रश्मि में चन्द्रमा का स्थित होना स्पष्ट परिलक्षित हो, उस समय उपर्युक्त विधि से ही उपस्थान (पूजन) करे। इसकी विशेषता मात्र इतनी ही है कि अर्घ्यपात्र में दो हरी दूर्वा के अंकुर भी रखे एवं उससे अर्घ्य देते हुए चन्द्रमा के प्रति "यत्ते सुसीमं हृदयमधि...... पौत्रमचं रुदम्" मंत्र से वाणी का प्रयोग करें। (इस मंत्र का भाव यह है) - 'हे सोममंडल की अधिष्ठात्री देवि! अतिसुन्दर भावना से युक्त आपका हृदय (हृदय में स्थित आनन्दमय स्वरूप) चन्द्रमण्डल में विद्यमान है, उसके द्वारा आप अमृतत्व पद पर भी अधिकार रखने वाली हैं। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें, जिससे कि कभी पुत्र के शोक से मुझे व्यचित होकर रोना न पड़े'। इस तरह से उपासना करने वाला यदि पुत्र को प्राप्त कर चुका हो, तो उसका पुत्र उसके मरने से पूर्व मृत्यु को नहीं प्राप्त होगा। यदि उसके कोई पुत्र उत्पन्न न हुआ हो, तो वह भी पूर्व की ही तरह सभी कार्य सम्पन्न करके दो हरी दूर्वा के अंकुर रख करके नीचे लिखे तीन मंत्रों का जप करे- (क) 'आप्यायस्व समेतु... संवृष्ण्यान्यभिमातिषाहः'। (ख) 'आप्यायमानो... धिष्वा'। (ग) 'यमादित्या... भुवनस्य गोपाः'। इन तीनों ऋचाओं का भावार्थ इस प्रकार है- (क) हे स्त्रीरूपी सोम! तुम पुरुष रूपी सूर्य के प्रकाश से विकास को प्राप्त हो। पुरुष के प्राकट्य का कारणभूत जो वीर्य अर्थात् अग्रि सम्बन्धी तेज है, वह तुम में स्थित हो। तुम सभी ओर से अन्न की प्राप्ति में सहायक बनो। (ख) हे सोम! तुम सौम्य गुणों से युक्त हो। तुम्हारा दिव्य रस सूर्य के तेज को प्राप्त करके पुरुष मात्र के लिए अत्यन्त हितकारी हो जाता है। इस दिव्य रस का सेवन करने वाले पुरुषों को पुष्टि दे करके उनके सभी शत्रुओं का पराभव कराने में भी आप पूर्ण सक्षम हैं। वे दुग्ध एवं जल, अन्न से निर्वाह करने वाले निरामिषभोजी जीवों को सुगमतापूर्वक मिलते रहें। आग्रेय तेज से प्रसन्नता को प्राप्त करते हुए तुम अमृतत्व की प्राप्ति में सहयोगी बनो तथा स्वयं ही स्वर्गलोक़ में अनुपम यश को स्थिर करो। (ग) द्वादश आदित्य रूपी पुरुष जिस स्त्री रूपी प्रकृतिमय सोम को अपने दिव्य तेज से आनन्दित करते हैं एवं स्वयं पुष्ट रहते हुए अक्षय बल से सम्पन्न, त्रिलोक को संरक्षण देते हैं, ऐसे राजा वरुण और बृहस्पति हम सभी को उस सोम रूपी अंशु (किरण) से आनन्द एवं शक्ति प्रदान करें। (घ) उपर्युक्त तीन ऋचाओं के जप के पश्चात् चन्द्रमा के समक्ष अपना दाहिना हाथ उठाये तथा नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करे- "मास्माकं प्राणेन. ..आदित्यस्यावृतमन्वावर्त इति। " मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है- हे सोम! तुम हमारे प्राण, संतान एवं पशुओं से स्वयं अपनी पुष्टि एवं तुष्टि न करो वरन् जो हमसे वैर-भाव रखते हैं तथा जिससे हम द्वेष-भाव रखते हैं, उनके प्राण, संतान और पशुओं से अपनी पुष्टि एवं तुष्टि अर्जित करो। इस प्रकार मैं इन मंत्र के अधिपति देवता का एवं तुम्हारी संचरण क्रिया का अनुवर्तन करता हूँ अर्थात् हे सोम! मैं तुम्हारी ही गति का अनुगमन करता हूँ। इस तरह ऋचा-पाठ से अपनी दाहिनी भुजा का अन्वावर्तन करे अर्थात् बार-बार घुमाये और अन्त में हाथ को नीचे कर ले।
(अब यहाँ पर एक अन्य प्रकार की उपासना बतलायी जाती है) पूर्णिमा के दिन सायंकाल में जब पूर्व दिशा में चन्द्रदेव का दर्शन होने लगे, तब उस समय पूर्व मन्त्र में बताई गई रीति के द्वारा उन चन्द्रदेव को अर्घ्य समर्पित करे। उपस्थान के समय निम्नांकित मंत्र का पाठ करना चाहिए- "सोमो राजाऽसि विचक्षणः आदित्यस्यावृतमन्वावर्तन्त"। इस मन्त्र का भावार्थ इस प्रकार है - हे सोम! संसार-प्रकृतिरूपा उमा के साथ रहने वाले तुम सोम नाम वाले राजा हो। तुम सभी लौकिक एवं वैदिक कार्यों में प्रवीण हो। तुम पाँच मुखों से युक्त प्रजापति हो। प्रजापति के रूप में सम्पूर्ण प्रजा का पालन करते हो। ब्राह्मण तुम्हारा एक मुख है। उस मुख के द्वारा तुम क्षत्रियों का भक्षण अर्थात् दमन करते हो। उस मुख द्वारा तुम मुझे अन्न को खाने एवं पचाने की सामर्थ्य प्रदान करो। क्षत्रिय तुम्हारा एक मुख है, उस मुख से तुम वैश्यों का भक्षण अर्थात् उन पर शासन करते हो, उस मुख द्वारा तुम मुझे अन्न का भक्षण करने एवं पचाने की शक्ति से सम्पत्र बनाओ। श्येन (बाज) भी तुम्हारा एक मुख है, तुम उस (बाज़) मुख से पक्षियों का दमन करते हो, उस मुख से तुम मुझे अन्न का भोगने वाला बनाओ। अग्नि भी तुम्हारा एक मुख है, उस मुख के द्वारा तुम इस लोक का दमन करते हो, उस मुख द्वारा मुझे भी अन्न का उपभोग करने वाला बनाओ। पाँचवाँ मुख तो तुम में ही है, उस मुख के द्वारा तुम समस्त भूत-प्राणियों का संहार करते हो, उस मुख द्वारा मुझे भी अन्न का उपभोग करने वाला बनाओ। तुम मेरे प्राण, संतान एवं पशुओं से हमें कमजोर न करो, वरन् जो हम से द्वेष-भाव रखते हों तथा जिससे हम द्वेष रखते हैं, उसे संतान, प्राण और पशुओं से नष्ट करो। मैं मन्त्राधिपति देवता का एवं तुम्हारी संचरण क्रिया का अनुसरण करने वाला हूँ। इस प्रकार से उपर्युक्त मंत्र का पाठ करते हुए दाहिनी भुजा को बारम्बार घुमाये तथा बाद में भुजा नीचे कर ले।
इस प्रकार से सोम की प्रार्थना करने के बाद (गर्भाधान के लिए) पत्नी के पास में बैठने से पहले उसके हृदय का स्पर्श करे। उस समय नीचे लिखे मन्त्र का पाठ करे (मन्त्र इस प्रकार है-) "यते सुसीमे... पौत्रमर्ष रुदम्।" इस मन्त्र का भाव इस प्रकार है - हे सुन्दर सीमन्त (माँग) बाली सुन्दरी। तुम सोम रूप वाली हो। तुम्हारा हृदय प्रजा (संतति) का पालक है। उसके अन्दर जो सोम मण्डल की तरह अमृत-राशि (दुग्ध) निहित है, उसे मैं जानता हूँ। अपने को मैं उसका पूर्ण ज्ञाता मानता हूँ। इस सत्य के प्रभाव से मैं कभी पुत्र से सम्बन्धित शोक से न रोऊं अर्थात् मुझे पुत्र का शोक कभी भी न झेलना पड़े। इस तरह की प्रार्थना करने से साधक के संतान की मृत्यु नहीं होती।
(इसके पश्चात् अब दूसरी उपासना का वर्णन करते हैं) परदेश में रहकर, वहाँ से वापस आया हुआ व्यक्ति अपने पुत्र के मस्तक का स्पर्श करते हुए निम्न मन्त्र को पढ़े- 'अङ्गादङ्गात्सम्भवसि .......शरदः शतम् असौ।' मंत्रार्थ - अमुक नाम से युक्त हे पुत्र ! तुम नरक से पार करने वाले हो। तुम मेरे अंग-प्रत्यङ्ग से उत्पन्न हुए हो। मेरे हृदय से तुम्हारा प्राकट्य हुआ है। तुम स्वयं मेरे ही आत्म स्वरूप हो। तुमने ही हमारी (हमारे वंश की) रक्षा की है। हे, पुत्र! तुम शतायु हो। यहाँ 'असौ' की जगह पर पुत्र के नाम का उच्चारण करना चाहिए और साथ ही नामोच्चारण के समय निम्न मंत्र का पाठ करना चाहिए- "अश्मा भव...... शतम् असौ" इसका भावार्थ इस प्रकार है - हे वत्स! तुम पत्थर, कुठार एवं बिछा हुआ सुवर्ण बनो अर्थात् तुम्हारा शरीर पत्थर की तरह सुगठित, बलवान्, स्वस्थ एवं नीरोग बने। तुम कुठार के सदृश शत्रुओं का दमन करने वाले तथा सुवर्ण राशि की तरह सभी के प्रिय बनो। समस्त अंग-अवयवों का सारभूत, संसार-वृक्ष का बीजरूप जो दिव्य तेज है, हे पुत्र! वह तेज तुम्हीं हो, तुम सौ वर्षों तक जीवित रहो। यहाँ पर फिर से' असी' के स्थान पर पुत्र का नाम लेना चाहिए और साथ ही निम्न मंत्र का पाठ भी करना चाहिए- 'पेन प्रजापतिः... परिगृह्णामि असौ।' प्रस्तुत मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है - "हे पुत्र! प्रजापति ब्रह्मा जी अपनी सृष्टि को नष्ट न होने देने के लिए उसे जिस तेज से युक्त करके अनुगृहीत करते हैं, उसी तेज से तुम भी युक्त हो। हे पुत्र! मैं तुम्हें सभी तरफ से स्वीकार करता हूँ। तत्पश्चात् यहाँ भी 'असौ' के स्थान पर पुत्र का ही नाम उच्चारण करे तथा पुत्र के दाहिने कान में नीचे लिखे मंत्र का पाठ करे- अस्मै प्रयन्धि .... द्रविणानि धेहि।" मन्त्रार्थ इस प्रकार है - हे मपवन्! आप सरल भाव का आश्रय लेकर इस पुत्र को संरक्षण प्रदान करें। पुनः इसी मंत्र को बायें कान में जपे। तत्पश्चात् पुत्र के मस्तक को सूपे तथा इस मन्त्र का पाठ करे- 'मा च्छित्था मा... मूर्धानमवजिघ्रामि असी। इस मन्त्र का भावार्थ इस प्रकार है - हे पुत्र ! संतान परम्परा का उच्छेद न करना। मन, वाणी एवं शरीर से तुम्हें कभी कष्ट न हो। तुम सैकड़ों वर्षों तक जीवित रहो। मैं तुम्हारा अमुक नाम से प्रख्यात पिता तुम्हारा नाम लेकर तुम्हारे मस्तक को सूप रहा हूँ। यहाँ पर 'असौ' के स्थान पर पिता को अपना नाम लेना चाहिए। इस मन्त्र पाठ के बाद तीन बार पुत्र का मस्तक सूपे, तत्पश्चात् निम्न मंत्र को पढ़कर मस्तक के सभी तरफ तीन बार हिंकार (हिं शब्द का उच्चारण) करे। 'गत्वा' हिंकरोमि।' हे अस। गौएँ जिस तरह से अपने बछड़े को बुलाने के लिए रंभाती हैं, वैसे ही प्रेमपूर्वक मैं भी तुम्हारे लिए हिंकार करता हूँ अर्थात् हिंकार द्वारा तुम्हें बुलाता हूँ।
(दैव 'परिमर' के रूप में प्राण की उपासना) अब इसके अनन्तर देवों से सम्बन्धित 'परिमर' का वर्णन करते हैं। (अग्रि एवं वाणी आदि देवता हैं, ये सभी क्षीण अथवा मृत होकर महाप्राण प्रवाह में ही विलीन होते हैं। इस ब्रह्मरूप प्राण को ही यहाँ पर 'परिमर' कहा गया है) यहाँ यह जो (प्रत्यक्ष रूप में अग्रि) प्रज्वलित है, इस रूप में स्वयं ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब अग्नि नहीं जलती है, तब उस मृत अर्थात् बुझी हुई अग्रि का तेज सूर्य में ही विलीन हो जाता है। इस प्रकार सूर्य जब दृष्टिगोचर नहीं होता, तब उसका तेज वायु और प्राण में विलीन हो जाता है। यह जो चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो रहा है, निश्चय ही इस रूप में ब्रह्म ही दीप्तिमान् हो रहा है। चन्द्र (जब वह दृष्टिगोचर नहीं होता है) का तेज भी प्राण एवं वायु को प्राप्त हो जाता है। यह जो विद्युत् काँधती है, निश्चय ही उस रूप में ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं कौंधती है, तब मानो यह मृत्यु को प्राप्त हो जाती। उस समय विद्युत् का तेज, वायु एवं प्राणं को प्राप्त हो जाता है। वे सभी प्रसिद्ध अग्रि, सूर्य, चन्द्रमा एवं विद्युत्-स्वरूप सभी देवगण प्राण में प्रविष्ट होकर स्थिर रहते हैं। वायु अर्थात् आधिदैविक प्राण में विलय को प्राप्त होकर वे विनष्ट नहीं होते, वरन् पुनः उस वायु से ही उनका प्राकट्य होता है। इस तरह से यह आधिदैविक दृष्टि हुई। अब आध्यात्मिक दृष्टि बतलाई जाती है।
पुरुष वाणी के द्वारा जो भी कुछ बोलता है, वह मानो ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब वह नहीं बोलता, उस समय 'वाक्' का तेज चक्षु को मिल जाता है, इस प्रकार प्राण का मिलन प्राण में हो जाता है। यह पुरुष चक्षु के माध्यम से जो भी कुछ देखता है, ऐसा लगता है कि ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब चक्षु से कुछ भी नहीं दिखाई देता, उस समय चक्षु का तेज श्रोत्र को मिल जाता है एवं प्राण प्राण में ही विलीन हो जाता है। यह जो भी कुछ श्रोत्र द्वारा श्रवण करता है, यह ऐसा प्रतीत होता है कि स्वयं ब्रह्म ही घोषित हो रहा है और जब यह श्रवण नहीं करता, उस समय उसका प्रकाश मन को प्राप्त हो जाता है तथा प्राण का प्राण में विलय हो जाता है। यह जो मन के द्वारा ध्यान करता है, यह मानो ब्रह्म ही घोषित हो रहा है और जब चिन्तन नहीं करता, तब उस समय मन का तेज भी प्राण में विलीन हो जाता है। इस तरह ये समस्त वाक्-इन्द्रिय आदि देवता प्राण में ही प्रवेश करके स्थित होते हैं। प्राण में विलीन होकर वे विनष्ट नहीं होते, इसलिए पुनः प्राण के द्वारा हो वे प्रकट होते हैं। उस दैव-परिमर अर्थात् प्राण का पूर्ण ज्ञान हो जाने के बाद यदि वे ज्ञानी पुरुष ऐसे दो ऊँचे पर्वतों को, जो पृथ्वी मण्डल के उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक फैले हों, अपनी इच्छानुसार चलने के लिए प्रेरित करें, तो वे पर्वत इन विद्वान् श्रेष्ठ पुरुषों की आज्ञा की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसके अतिरिक्त जो भी मनुष्य इस 'दैव परिमर' के जानकार श्रेष्ठ पुरुष से द्वेष-भाव करते हैं या फिर वह खुद ही जिनसे द्वेष रखता है, वे सब के सब सदैव के लिए विनष्ट हो जाते हैं।
अब मोक्ष (मोक्ष हेतु सर्वश्रेष्ठ प्राण की उपासना) आदि साधन के गुणों से विशिष्ट सर्वश्रेष्ठ प्राण को उपासना का वर्णन किया जाता है। एक समय वाणी आदि समस्त देवता अहंकार के वशीभूत हो, अपनी-अपनी महत्ता सिद्ध करने हेतु आपस में विवाद करने लगे। वे सभी प्राण के साथ ही शरीर से बहिर्गमन कर गये। उन वाणी आदि सभी इन्द्रियों के निकल जाने पर वह शरीर काष्ठ की भाँति चेष्टारहित होकर सो गया। इसके अनन्तर उस शरीर में वाणी ने प्रवेश किया। वाक् शक्ति के प्रविष्ट होते ही वह वाणी से बोलने लगा, लेकिन वह अपने स्थान से उठ न सका, सोया ही रहा। इसके बाद नेत्रेन्द्रिय ने उस शरीर में प्रवेश किया। तब वह वाणी से बोलता और चक्षु से देखता हुआ भी सोया ही रहा, उठने में प्राय: असमर्थ हो रहा। तदनन्तर उस शरीर में श्रोत्रेन्द्रिय ने प्रवेश किया। उस समय भी वह वाक् से बोलता, चक्षु से देखता एवं कानों से श्रवण करता हुआ भी सोया ही रहा, वह उठने में असमर्थ ही बना रहा। तत्पश्चात् उस शरीर में मन प्रविष्ट हुआ। तब बह शरीर वाणी से बोलता, चक्षु से देखता, कान से श्रवण करता एवं मन से सोचता (विचार करता) हुआ भी पढ़ा ही रहा, उठ नहीं सका। तब सभी के बाद में प्राण ने उस शरीर में प्रवेश किया। उस प्राण तत्त्व के प्रविष्ट होते ही वह शरीर उठ बैठा। तत्पश्चात् उन वाणी आदि देवताओं ने प्राण में ही मोक्ष आदि साधन की शक्ति को जानकर एवं विशिष्ट ज्ञान स्वरूप प्राण को ही सभी तरफ से व्याप्त जानकर के प्राण-अपान आदि सभी प्राणों के सहित इस शरीर रूपी लोक से ऊर्ध्व की ओर अर्थात् शरीर से बाहर गमन किया। इसके बाद वे प्राण वायु में अर्थात् आधिदैविक प्राण में स्थिर होकर के आकाश रूप में परिणत हो स्वर्ग लोक में गये। वे अपने अधिष्ठातृ देवता अग्नि आदि के स्वरूप को प्राप्त हो गये। वैसे ही इस रहस्य को जानने वाले विद्वान् सम्पूर्ण प्राणियों के प्राण को ही प्रज्ञात्मारूप से पाकर इन प्राण-अपान आदि सभी प्राणों के साथ इस शरीर से उत्क्रमण कर, वायु में स्थित हो, आकाशरूप में परिणत हो स्वर्ग लोक को गमन करते हैं। वह मनीषी वहाँ उस प्रसिद्ध प्राण का ही रूप हो जाता है, जिसमें ये सभी वाक् आदि देवता प्रतिष्ठित होते हैं। उस प्राण-तत्त्व को पाकर वह मनीषी प्राण के उस अमृतत्व गुण से सम्पन्न हो जाता है, जिस अमृतत्व गुण से वे वाणी आदि समस्त देवता भी प्रकट होते हैं।
(प्राणोपासक का सम्प्रदान-कर्म) अब पिता-पुत्र के सम्प्रदान कर्म का वर्णन करते हैं। जब पिता यह निश्चय करे कि मुझे अब इस शरीर का परित्याग करना है, तब वह अपने पुत्र को पास में बुलाए। तत्पश्चात् कुश-कासादि तृणों से यज्ञशाला को ढक करके विधि-विधान से अग्नि को स्थापित करे। अग्रि के उत्तर या पूर्व दिशा में जल से भरा हुआ कलश प्रतिष्ठित करे। कलश के ऊपर धान्य से भरा हुआ पूर्ण-पात्र भी रखे। स्वयं भी नवीन वस्त्र (धोती एवं उत्तरीय) का आच्छादन करे। इस तरह चेत शुभ्र वस्त्र एवं माला आदि धारण करते हुए घर में प्रवेश करके पुत्र को अपने पास बुलाये। जब पुत्र पास में आ जाए, तो उसे अपने अङ्क में भर ले एवं अपनी इन्द्रियों से पुत्र की इन्द्रियों का स्पर्श करे। या फिर केवल पुत्र के समक्ष बैठ जाए और उसे अपनी वाक् आदि समस्त इन्द्रियों का दान करे। पिता कहे - हे पुत्र! मैं तुम में अपनी वाक् शक्ति की स्थापना करता हूँ। पुत्र कहे - पिताजी में आपकी वागिन्द्रिय को ग्रहण करता हूँ। पिता - हे पुत्र! मैं अपने प्राण को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके प्राणतत्त्व को अपने में धारण करता हूँ। पिता - हे पुत्र। मैं अपनी नेत्रेन्द्रिय को तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र - मैं आपके नेत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपनी श्रोत्रेन्द्रिय को तुममें स्थापना करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी श्रोत्रेन्द्रिय को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने अन्न-रसों को तुममें स्थिर करता हूँ। पुत्र - मैं आपके अन्न रसों को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने सभी श्रेष्ठ कर्मों को तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके समस्त शुभ कर्मों को अपने में धारण करता हूँ। पिता - मैं अपने सुख एवं दुःख को भी तुममें प्रतिष्ठित करता हूँ। पुत्र - मैं आपके सभी तरह के सुख एवं दुःखों को स्वीकार करता हूँ। पिता - हे पुत्र। मैं तुममें मैथुन जनित आनन्द, रति एवं सन्तान की उत्पत्ति को शक्ति स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी उस शक्ति को अपने में धारण करता हूँ। पिता - हे पुत्र! मैं अपनी गतिशक्ति तुममें स्थापित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी गतिक्ति को स्वयं में ग्रहण करता हूँ। पिता - मैं अपनी बुद्धि-वृतियों को, बुद्धि द्वारा ज्ञात विषयों को एवं विशेष इच्छाओं को तुममें स्थित करता हूँ। पुत्र - मैं आपकी बुद्धि वृत्तियों को, बुद्धि के द्वारा ज्ञात विषयों को एवं इच्छाओं को धारण करता हूँ। तत्पश्चात् पुत्र पिता की प्रदक्षिणा करते हुए प्राची दिशा की तरफ पिता के पास से निकलता है। उस समय पिता पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहे - 'यश, ब्राह्मतेज, अन को ग्रहण करने एवं पचाने की सामर्थ्य तथा श्रेष्ठ-कीर्ति ये सभी सद्गुण तुम्हारा सेवन करें।' पिता के इस तरह कहने पर पुत्र अपने बायें कन्धे की तरफ नजर घुमाकर देखते हुए हाथ से ओट-करके या फिर कपड़े को सामने करके उसकी आड़ से पिता से इस प्रकार कहे - 'आप अपनी इच्छानुसार कामनायुक्त स्वर्ग को एवं वहाँ के समस्त भोगों की प्राप्ति करें।' इसके अनन्तर यदि पिता नीरोग हो, तो वह पुत्र को घर का स्वामी मानकर उसके साथ निवास करे या सर्वस्व त्यागकर घर से बाहर निकलकर संन्यासी हो जाए या फिर यदि वह दूसरे लोक को चला जाये, तो जिन-जिन वाणी आदि इन्द्रियों को उसने पुत्र में प्रतिष्ठित किया था, उन सभी की शक्ति धाराओं का वह अधिकारी बन जाता है। वे सम्पूर्ण शक्ति-धाराएँ उसे प्राप्त हो जाती हैं। (यही वास्तव में सही उत्तराधिकार है।)
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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