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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 2 • श्लोक 10
अथ संवेश्यञ्जायायै हृदयमभिमृशेद्यत्ते सुसीमे हृदये हितमन्तः प्रजापती मन्येऽहं मां तद्विद्वांसं तेन माऽहं पौत्रमधं रुदमिति न हास्मात्पूर्वाः प्रजाः प्रैतीति ॥
इस प्रकार से सोम की प्रार्थना करने के बाद (गर्भाधान के लिए) पत्नी के पास में बैठने से पहले उसके हृदय का स्पर्श करे। उस समय नीचे लिखे मन्त्र का पाठ करे (मन्त्र इस प्रकार है-) "यते सुसीमे... पौत्रमर्ष रुदम्।" इस मन्त्र का भाव इस प्रकार है - हे सुन्दर सीमन्त (माँग) बाली सुन्दरी। तुम सोम रूप वाली हो। तुम्हारा हृदय प्रजा (संतति) का पालक है। उसके अन्दर जो सोम मण्डल की तरह अमृत-राशि (दुग्ध) निहित है, उसे मैं जानता हूँ। अपने को मैं उसका पूर्ण ज्ञाता मानता हूँ। इस सत्य के प्रभाव से मैं कभी पुत्र से सम्बन्धित शोक से न रोऊं अर्थात् मुझे पुत्र का शोक कभी भी न झेलना पड़े। इस तरह की प्रार्थना करने से साधक के संतान की मृत्यु नहीं होती।
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