(दैव 'परिमर' के रूप में प्राण की उपासना) अब इसके अनन्तर देवों से सम्बन्धित 'परिमर' का वर्णन करते हैं। (अग्रि एवं वाणी आदि देवता हैं, ये सभी क्षीण अथवा मृत होकर महाप्राण प्रवाह में ही विलीन होते हैं। इस ब्रह्मरूप प्राण को ही यहाँ पर 'परिमर' कहा गया है) यहाँ यह जो (प्रत्यक्ष रूप में अग्रि) प्रज्वलित है, इस रूप में स्वयं ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब अग्नि नहीं जलती है, तब उस मृत अर्थात् बुझी हुई अग्रि का तेज सूर्य में ही विलीन हो जाता है। इस प्रकार सूर्य जब दृष्टिगोचर नहीं होता, तब उसका तेज वायु और प्राण में विलीन हो जाता है। यह जो चन्द्रमा दृष्टिगोचर हो रहा है, निश्चय ही इस रूप में ब्रह्म ही दीप्तिमान् हो रहा है। चन्द्र (जब वह दृष्टिगोचर नहीं होता है) का तेज भी प्राण एवं वायु को प्राप्त हो जाता है। यह जो विद्युत् काँधती है, निश्चय ही उस रूप में ब्रह्म ही प्रकाशित हो रहा है। जब यह नहीं कौंधती है, तब मानो यह मृत्यु को प्राप्त हो जाती। उस समय विद्युत् का तेज, वायु एवं प्राणं को प्राप्त हो जाता है। वे सभी प्रसिद्ध अग्रि, सूर्य, चन्द्रमा एवं विद्युत्-स्वरूप सभी देवगण प्राण में प्रविष्ट होकर स्थिर रहते हैं। वायु अर्थात् आधिदैविक प्राण में विलय को प्राप्त होकर वे विनष्ट नहीं होते, वरन् पुनः उस वायु से ही उनका प्राकट्य होता है। इस तरह से यह आधिदैविक दृष्टि हुई। अब आध्यात्मिक दृष्टि बतलाई जाती है।
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