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कौषीतकिब्राह्मण • अध्याय 2 • श्लोक 7
अथातः सर्वजितः कौषीतकेस्त्रीण्युपासनानि भवन्ति यज्ञोपवीतं कृत्वाऽप आचम्य त्रिरुदपात्रं प्रसिच्योद्यन्तमादित्यमुपतिष्ठेत वर्गों ऽसि पाप्मानं मे वृद्धीत्येतयैवावृता मध्ये सन्तमुद्वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृद्धीत्येतयैवावृताऽस्तं यन्तं संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृद्धीति । यदहोरात्राभ्यां पापं करोति सं तद्वृङ्क्ते ॥
(विविध उपासनाओं का वर्णन) इसके पश्चात् अब कौषीतकि ऋषि के द्वारा अनुभव में लायी हुई तीन बार सम्पन्न की जाने वाली उपासना पद्धति कही जाती है। यज्ञोपवीत को सव्य भाव से बायें कन्धे पर रखकर आचमन करे तदनन्तर जल पात्र को तीन बार शुद्ध जल से भरकर उदय होते हुए सूर्य को अर्घ्य प्रदान करे। (अर्घ्य प्रदान करते समय इस मन्त्र का उच्चारण करे) 'ॐ वर्गोऽसि पाप्मानं मे वृधि' अर्थात् 'संसार को तृणवत् त्याग देने से तुम वर्ग कहलाते हो, मेरे पापों को मुझसे दूर करो। इसी तरह मध्याह्नकाल में भी भगवान् भास्कर का उपस्थान करे। (उस समय इस मंत्र का उच्चारण करे) 'ॐ उद्वगोंऽसि पाप्मानं मे संवृद्धि' अर्थात् तुम उद्वर्ग कहे जाते हो, मेरे पापों को नष्ट करो। इसी तरह से सायंकाल में अस्त होते हुए भगवान् सूर्य का निम्न मंत्र से उपस्थान करे - 'ॐ संवर्गोऽसि पाप्मानं मे संवृधि' अर्थात् तुम सवर्ग कहलाते हो, अत: मेरे पापों को दूर करो। इस उपासना का परिणाम यह है कि मनुष्य दिन एवं रात्रि में होने वाले समस्त पापों का पूर्णतः परित्याग करने में समर्थ हो जाता है।
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