अथात एकधनावरोधनं यदेकधनमभिध्यायात्पौर्णमास्यां वाऽमावास्यायां वा शुद्धपक्षे वा पुण्ये नक्षत्रेऽग्निमुपसमाधाय परिसमूह्य परिस्तीर्य पर्युक्ष्योत्पूय दक्षिणं जान्वाच्य स्रुवेण वा चमसेन वा कंसेन वैता आज्याहुतीर्जुहोति वाङ्नाम देवताऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा। प्राणो नाम देवताऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाह्य । चक्षुर्नाम देवताऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा । श्रोत्रं नाम देवताऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा। मनो नाम देवताऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहा। प्रज्ञा नाम देवता ऽवरोधिनी सा मेऽमुष्मादिदमवरुन्धां तस्यै स्वाहेत्यथ धूमगन्धं प्रजिघ्रायाज्यलेपेनाङ्गान्यनु विमृज्य वाचंयमो ऽभिप्रव्रज्यार्थं ब्रुवीत दूतं वां प्रहिणुयाल्लभते हैव ॥
अब एकमात्र धन (प्राण) के निरोध की बात कही जाती है। यदि एक मात्र धन (प्राण) का ध्यान करे, तो पूर्णिमा अथवा अमावस्या को या फिर शुक्ल अथवा कृष्ण पक्ष की किसी भी शुभ-तिथि को पुण्य (श्रेष्ठ नक्षत्र में अग्रि की स्थापना, (वेदी का) परिसमूहन संस्कार, कुशों का बिछाना, अभिमन्त्रित जल से अग्निवेदो आदि का अभिषेक एवं अग्रि पर पात्र में रखे हुए घृत का शोधन करके दाहिने घुटने को पृथ्वी पर स्थिर करके स्रुवा से, चमस से या काँसे की करछुल से (मूल संस्कृत में दिये गये वाङ्नाम देवता..... स्वाहा आदि मन्त्रों द्वारा) विधिवत् आहुति समर्पित करे।
मन्त्रों के भाव इस प्रकार हैं - ॐ वाङ्नाम देवतावरोधिनी.. अवरुन्धां तस्यै स्वाहा - 'वाणी' नाम से प्रसिद्ध देवी अवरोधिनी साधक की कामना पूर्ति करने वाली है। वह मुझ प्राण की उपासना करने वाले को अमुक व्यक्ति से इच्छित अर्थ की सिद्धि कराये; उसके लिए यह घृताहुति सादर समर्पित है। प्राण देवता अभीष्ट सिद्धि प्रदान करने में समर्थ हैं, वे मुझ प्राणोपासक को धन (प्राण) की प्राप्ति कराएँ। इसके लिए यह आहुति समर्पित है। चक्षु नाम से युक्त देवी कामनापूर्ति में सहायक है, वह देवी मुझ प्राणोपासक को अमुक व्यक्ति से अभीष्ट धन (प्राण) प्राप्त कराए। यह घृताहुति उसी के लिए समर्पित है। श्रोत्र नाम से युक्त देवी अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है, वह मुझ प्राणस्वरूप ब्रह्म के साधक को अमुक व्यक्ति से इच्छित धन (प्राणों) की प्राप्ति कराये, इसके निमित्त यह घृताहुति समर्पित है। 'मन' नाम वाली देवी अभीष्ट फल प्रदान करने वाली है, वह मुझ प्राण की उपासना करने वाले को अमुक व्यक्ति से इच्छित धन (प्राण) की प्राप्ति कराये, यह घृताहुति उसके निमित्त समर्पित है। 'प्रज्ञा' नामक देवी इच्छित फल देने वाली है। वह मुझ प्राणदेव के उपासक को अमुक व्यक्ति से अभीष्ट धन (प्राण) की प्राप्ति कराये। यह आहुति उसके लिए ही समर्पित है। इस तरह से आहुतियाँ देने के बाद होम-धूम की गन्ध को ग्रहण करके हवन से बचे हुए घृत से अपने अंगों में लेपन करके मौन भाव से धन-स्वामी के समीप में गमन करे और इच्छित अर्थ के सम्बन्ध में कहे कि इतने धन की मुझे विशेष आवश्यकता है। अतः आपके यहाँ प्राप्त हो जाना चाहिए अथवा यदि धनिक कहीं दूर है, तो किसी दूत के द्वारा उक्त संदेश कहलाने के लिए उसके पास भेज देना चाहिए। इस प्रकार के कार्य द्वारा अभीष्ट धन (प्राण) की प्राप्ति हो जाती है।
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