(अब दूसरी उपासना का वर्णन करते हैं) हर महीने की अमावस्या को, जब सूर्य के पश्चिम भाग में स्थित सुषुम्ना नामक रश्मि में चन्द्रमा का स्थित होना स्पष्ट परिलक्षित हो, उस समय उपर्युक्त विधि से ही उपस्थान (पूजन) करे। इसकी विशेषता मात्र इतनी ही है कि अर्घ्यपात्र में दो हरी दूर्वा के अंकुर भी रखे एवं उससे अर्घ्य देते हुए चन्द्रमा के प्रति "यत्ते सुसीमं हृदयमधि...... पौत्रमचं रुदम्" मंत्र से वाणी का प्रयोग करें। (इस मंत्र का भाव यह है) - 'हे सोममंडल की अधिष्ठात्री देवि! अतिसुन्दर भावना से युक्त आपका हृदय (हृदय में स्थित आनन्दमय स्वरूप) चन्द्रमण्डल में विद्यमान है, उसके द्वारा आप अमृतत्व पद पर भी अधिकार रखने वाली हैं। आप मुझ पर ऐसी कृपा करें, जिससे कि कभी पुत्र के शोक से मुझे व्यचित होकर रोना न पड़े'। इस तरह से उपासना करने वाला यदि पुत्र को प्राप्त कर चुका हो, तो उसका पुत्र उसके मरने से पूर्व मृत्यु को नहीं प्राप्त होगा। यदि उसके कोई पुत्र उत्पन्न न हुआ हो, तो वह भी पूर्व की ही तरह सभी कार्य सम्पन्न करके दो हरी दूर्वा के अंकुर रख करके नीचे लिखे तीन मंत्रों का जप करे-
(क) 'आप्यायस्व समेतु... संवृष्ण्यान्यभिमातिषाहः'।
(ख) 'आप्यायमानो... धिष्वा'।
(ग) 'यमादित्या... भुवनस्य गोपाः'।
इन तीनों ऋचाओं का भावार्थ इस प्रकार है-
(क) हे स्त्रीरूपी सोम! तुम पुरुष रूपी सूर्य के प्रकाश से विकास को प्राप्त हो। पुरुष के प्राकट्य का कारणभूत जो वीर्य अर्थात् अग्रि सम्बन्धी तेज है, वह तुम में स्थित हो। तुम सभी ओर से अन्न की प्राप्ति में सहायक बनो।
(ख) हे सोम! तुम सौम्य गुणों से युक्त हो। तुम्हारा दिव्य रस सूर्य के तेज को प्राप्त करके पुरुष मात्र के लिए अत्यन्त हितकारी हो जाता है। इस दिव्य रस का सेवन करने वाले पुरुषों को पुष्टि दे करके उनके सभी शत्रुओं का पराभव कराने में भी आप पूर्ण सक्षम हैं। वे दुग्ध एवं जल, अन्न से निर्वाह करने वाले निरामिषभोजी जीवों को सुगमतापूर्वक मिलते रहें। आग्रेय तेज से प्रसन्नता को प्राप्त करते हुए तुम अमृतत्व की प्राप्ति में सहयोगी बनो तथा स्वयं ही स्वर्गलोक़ में अनुपम यश को स्थिर करो।
(ग) द्वादश आदित्य रूपी पुरुष जिस स्त्री रूपी प्रकृतिमय सोम को अपने दिव्य तेज से आनन्दित करते हैं एवं स्वयं पुष्ट रहते हुए अक्षय बल से सम्पन्न, त्रिलोक को संरक्षण देते हैं, ऐसे राजा वरुण और बृहस्पति हम सभी को उस सोम रूपी अंशु (किरण) से आनन्द एवं शक्ति प्रदान करें।
(घ) उपर्युक्त तीन ऋचाओं के जप के पश्चात् चन्द्रमा के समक्ष अपना दाहिना हाथ उठाये तथा नीचे लिखे मंत्र का उच्चारण करे-
"मास्माकं प्राणेन. ..आदित्यस्यावृतमन्वावर्त इति। "
मंत्र का भावार्थ इस प्रकार है-
हे सोम! तुम हमारे प्राण, संतान एवं पशुओं से स्वयं अपनी पुष्टि एवं तुष्टि न करो वरन् जो हमसे वैर-भाव रखते हैं तथा जिससे हम द्वेष-भाव रखते हैं, उनके प्राण, संतान और पशुओं से अपनी पुष्टि एवं तुष्टि अर्जित करो। इस प्रकार मैं इन मंत्र के अधिपति देवता का एवं तुम्हारी संचरण क्रिया का अनुवर्तन करता हूँ अर्थात् हे सोम! मैं तुम्हारी ही गति का अनुगमन करता हूँ। इस तरह ऋचा-पाठ से अपनी दाहिनी भुजा का अन्वावर्तन करे अर्थात् बार-बार घुमाये और अन्त में हाथ को नीचे कर ले।
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